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आचार्य श्री कनकनंदी जी का लक्ष्य, साधना एवं अनुभव 

|| मेरा लक्ष्य, साधना एवं अनुभव ||

आचार्य कनकनन्दी अनेक वर्षों से अनेकों ने विशेषतः जो मेरे पास अध्ययन करते हैं या मेरे साहित्यों का अध्ययन करते हैं ऐसे स्व-पर संघ के साधु संत, ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारिणी, शिविर के विद्यार्थी तथा विद्वान्, प्रोफेसर्स, वैज्ञानिक आदि का आग्रह रहा है कि गुरुदेव! आप कृपया आपकी जीवनी हमें बताये जिससे हमें प्रेरणा मिलेगी। परंतु यह सब मेरे से संभव नहीं होने के कारण उनका पुनः आग्रह रहा कि आप अवश्य अपनी प्रेरणादायी जीवनी लिखें जिससे हमें प्रेरणा मिलें तथा दूसरे लाभान्वित होवे। मैं यह सब नहीं चाहने के कारण, मैं मेरी जन्मजयंती, दीक्षा जयंती, आचार्य जयंती आदि न मनाता हूँ न मनवाने देता हूँ, यहाँ तक कि हमारे मूल बड़ा संघ (आ. कुंथुसागर जी ससंघ) में भी किसी की भी जन्मजयंती आदि मनाने नहीं देता था यहाँ तक कि मैं अपने लेख, साहित्य, शिविर, संगोष्ठी, संस्था आदि का नामकरण मेरे नाम पर नहीं करता हूँ भले इसके लिए दूसरों का कितना भी आग्रह क्यों न होता हो। यहाँ तक कि पहले-पहले 1983 तक मेरे लेख एवं साहित्य में मैं मेरा नाम नहीं देता था। परन्तु दूसरे की अप्रमाणिकता तथा आ. कुंथुसागर गुरुदेव की आज्ञा से लेख आदि में नाम देने लगा। वह भी

पहले तो आचार्यश्री स्वयं मेरा नाम लेख आदि में लिखते थे। 1993 तक मैं मेरा फोटो भी खिंचवाने नहीं देता था। तथा पुस्तक आदि में नहीं देता था क्योंकि नाम, प्रसिद्धि, ख्याति-पूजा आदि का लक्ष्य मेरा बाल्यकाल से ही नहीं रहा है तथापि दसरों के बार-बार जिज्ञासापर्ण सनम्र आग्रह से कछ लिखने के लिए प्रेरित हुआ हूँ। दूसरों के आग्रह, आवश्यकता, उपयोगिता, जानकारी, प्रभावना, प्रचारप्रसार के लिए जीवनी, फोटो, संस्था परिचय, कार्यक्रम आदि का प्रकाशन कर रहा हूँ। इसके पर्व मैंने विद्यार्थियों के हितार्थ मेरे विद्यार्थी जीवन के बारे में लिखा था जो कि "धर्म दर्शन विज्ञान प्रवेशिका'' पुष्प तृतीय में तथा 'सेवा संदीपनी' नारायण सेवा संस्थान की पत्रिका में प्रकाशित हुआ हैं। संघस्थ उपाध्याय विद्यानन्दी द्वारा लिखित "सत्यानवेषी आ. कनकनन्दीजी का व्यक्तित्व-कृतित्व'' भी प्रकाशित हुआ है। इस लेख में मैं विशेषतः ‘मेरा लक्ष्य, साधना एवं अनुभव' के बारे में स्व-पर हितार्थ के लिए किंचित् प्रकाश डालूँगा। भविष्य में मेरे अनुभवों के बारे में विस्तृत प्रकाश डालने का विचार है।

1. मेरा लक्ष्य सत्य-ज्ञान एवं स्व-पर शाति : मुख्यतः पूर्व संस्कार के कारण मैं शिशु अवस्था से ही सत्य जिज्ञासु रहा हूँ। मैं कौन? संसार क्या? भगवान् का स्वरूप क्या? संसार में प्राणी दुःखी क्यों? मनुष्य अन्याय, अत्याचार क्यों करता है? दूसरों को दुःख क्यों देता है आदि के बारे में जिज्ञासा होने लगी थी। इसे जानने के लिए देश-विदेश के धर्म, दर्शन, तर्क, पुराण, सिद्धान्त आदि का अध्ययन करने लगा। तीसरी और चौथी कक्षा से ही कोर्स की पुस्तकों के साथ-साथ उपर्युक्त साहित्यों का अध्ययन करना उस संबंधी चर्चा, जिज्ञासा मनन, चिंतन, शास्त्र प्रवचन, श्रवण, तर्क-वितर्क करने लगा था। मेरी बुद्धि-लब्धि अच्छी होने के कारण मुझे कोर्स की पुस्तकें ज्यादा नहीं पढ़ना पड़ता था तथापि मैं विभाग, कक्षा, विद्यालय में सर्वोत्तम आता था तथा दूसरें बच्चों को निःशुल्क ट्यूशन पढ़ाता था, कक्षा में भी शिक्षकों के आदेश के अनुसार पढ़ाता था। इतना ही नहीं आवश्यकतानुसार माता-पिता, पशुपक्षी, रोगी-गरीब, अनाथ, असहाय आदि की सेवा, सहयोग करता था। योग्य सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेता था, सहयोग करता था परन्तु शादी विवाह, मृत्यु भोज, सामाजिक, धार्मिक कुरीतियाँ, लड़ाई-झगड़े आदि में भाग नहीं लेता था अपरंच उसके संशोधन के लिए बोलता था, करता था। मेरा लक्ष्य विद्यार्थी जीवन से ही सत्य-ज्ञान-स्व-पर सुख होने के कारण मैं मानव एवं प्राणी मात्र की सेवा करने के लिए राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय नेता, वैज्ञानिक या सच्चा स्व-पर हितकारक साधु बनना चाहता था। उपर्युक्त लक्ष्यानुसार अध्ययन एवं प्रायोगीकरण भी करता आ रहा हूँ। विभिन्न धर्म के (जैन, हिन्दू,बौद्ध) के तीर्थ स्थल, ऐतिहासिक स्थल, पर्यटन स्थल, नदी, पर्वत, संग्रहालय, ग्रंथालय, चिड़ियाघरों में भ्रमण/परीक्षण-निरीक्षण/अध्ययन आदि के कारण भी कोर्स की पुस्तकें कम बार पढ़ने पर भी समझने में आ जाती थी, याद रहती थी और ट्यूशन नकल के बिना भी अच्छे स्थान आ जाते थे। कुछ विषयों में तो उच्च कक्षा के विद्यार्थियों से भी मेरा ज्ञान अच्छा था और उस विषय को उच्च कक्षा के विद्यार्थियों को समझा देता था। तथापि मेरा लक्ष्य नौकरी करना विवाह करना, नाम कमाना नहीं रहा। मेरी बाल्यकाल से प्रतिज्ञा रही है।

1) मैं जीवनभर बालक (सहज-सरल) रहूँगा 

2) जीवनभर विद्यार्थी (सत्य जिज्ञासु, अध्ययनशील) रहूँगा।

मैं विद्यार्थी जीवन से तार्किक, प्रगतिशील, वैज्ञानिक, गणितीय बुद्धि सम्पन्न, हिताहित विवेक से सम्पन्न, सरल-सहज, शालीन, शांतप्रिय, एकांत सेवी, मौनवृत्ति, अध्ययनशील, नवीन-नवीन विचारशील, संवेदनशील, दयालु, परोपकारी, ईमानदार, परदुःखकातर, परहित चिंतक, राष्ट्रप्रेमी, कर्त्तव्यनिष्ठ, अनुशासनप्रिय, सादा जीवन उच्च विचार वाला, किसी का कभी अंधानुकरण न करने वाला, सहृदयी, प्रखर प्रज्ञावान्, दृढ़ निश्चयी, सत्य, न्याय का पक्षधर, गुणग्राही, सत्साहसी, समयानुबद्ध, दूसरों की बातों में नहीं फँसने वाला होते हुए भी सत्यांश को स्वीकारने वाला हूँ। इन सब कारणों के कारण दूसरों के दुःखों से दुःखी हो जाता हूँ। विशेषतः जब कोई निर्दोष प्राणियों को कष्ट पहुँचाता है, सत्य एवं न्याय के विरुद्ध बोलता है, लिखता है, काम करता है तब मुझे बहुत ही दुःख होता है। इन सब कारणों के कारण मैं विद्यार्थी जीवन से लेकर ब्रह्मचारी अवस्था तक घंटों-घंटों तक रोता रहा हूँ। समाज, राष्ट्र, राजनीति, व्यापार, नौकरी आदि में भ्रष्टाचार होने के कारण तथा आध्यात्मिक-वैज्ञानिक धर्म से जो मेरा लक्ष्य “सत्य ज्ञान एवं स्व-पर शांति'' है उसकी सिद्धि संभव होने से मैं साधु बना हूँ।

2) सत्यग्राही, सत्साहसी, युग के आगे : उपर्युक्त गुणों के साथ-साथ सत्य को स्वीकार करने का, उसे प्रगट करने का, लिखने का मेरे अंदर अदम्य सत्साहस है। इतना ही नहीं स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के साहित्य, धार्मिक, ऐतिहासिक, कानूनी, राजनैतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक परम्परादि में या उसके सिद्धान्त या क्षेत्र में जो कुछ कमियाँ, गलतियाँ, भ्रान्तियाँ हैं वे सब मुझे शीघ्रता से समझ में आ जाती हैं और उसे संशोधन करने के लिए मैं यथायोग्य सनम्रता से, अनुशासनबद्धता से दूर करने के लिए बाल्यकाल से ही प्रयासरत हूँ। मैं स्वयं किसी भी प्रकार की मिथ्या परम्परा, अन्धविश्वास, अतिवाद, भ्रान्तियों को न स्वीकार करता हूँ और न नकारने में संकोच या भय करता हूँ। मैं बाल्यकाल से ही मृत्यु भोज, बाल विवाह, हिंसा, भ्रष्टाचार, मिलावट, अन्याय, अत्याचार, अन्धा कानून, भ्रष्ट राजनीति, भेदभाव, संकीर्ण मतवाद, रूढ़िवादिता, पाश्चात्य अन्धानुकरण, आधुनिकता के नाम पर स्वच्छन्दता, अश्लीलता-फूहड़ता, फैशन-व्यसन, मादक वस्तुओं का प्रयोग, फास्ट फूड, रेडीमेड भोजन आदि को न स्वीकार करता हूँ और न सही मानता हूँ। इतना ही नहीं बड़े-बड़े चिन्तक, दार्शनिक, लेखक, क्रांतिकारी, राजनेता यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के सिद्धान्तों को भी अन्धभक्त रूप में स्वीकार नहीं करता हूँ। इनसे भी कुछ क्षेत्र में अधिक प्रगतिशील आगे के विचार, चिंतन, सिद्धान्त के बारे में सोचता हूँ, बोलता हूँ एवं लिखता हूँ। उपर्युक्त विषयों को मैं प्रायः 25 वर्षों से मेरे 1) विश्व विज्ञान रहस्य 2) धर्म दर्शन एवं विज्ञान 3) विश्व द्रव्य विज्ञान 4) ब्रह्माण्डीय जैविक, भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान 5) अनन्त शक्ति सम्पन्न परमाणु से लेकर परमात्मा 6) वैज्ञानिक आईन्सटीन के सिद्धान्तों को पुनः परीक्षण की आवश्यकता 7) ब्रह्माण्ड एवं प्रति ब्रह्माण्ड : धार्मिक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण 8) अतिमानवीय शक्ति 9) स्वप्न विज्ञान 10) स्वतंत्रता के सूत्र 11) सत्य साम्य सुखामृतम् 12) भविष्य फल विज्ञान आदि 350 ग्रंथों में मैंने लिखा है और अभी भी सतत लिख रहा हूँ। शिविर, वेबिनार, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी, धार्मिक प्रवचन, सार्वजनिक प्रवचन, स्कूल, कॉलेज आदि में प्रवचन, शिविर, वाक्पीठ सम्मेलन आदि में उपर्युक्त विषयों को बताता हूँ। इतना ही नहीं राज्य से लेकर केन्द्रीय शिक्षा अनुसंधान केन्द्र के निर्देशक, कार्यकर्ताओं को साक्षात या पत्र के माध्यम से बताता है। राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार एवं हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी जो दोष कमियाँ एवं भ्रष्टाचार है उसे भी दूर करने के लिए लिखता, बोलता, रिपोर्ट भेजता हूँ, लोकहित याचिका भेजता हूँ। उपर्युक्त कार्यों में मुझे बहुत ही सफलता मिल रही है और उसके लिए विभिन्नप्रबुद्ध जन एवं संगठन भी सहयोग कर रहे हैं। कुछ लोग आउट ऑफ डेट (पिछड़े) तो कुछ लोग अप टू डेट (अद्यतन, आधुनिक) होते हैं परन्तु मैं न आउट ऑफ डेट हूँ न अप टू डेट हूँ। मैं बाल्यकाल से ही फॉरवर्ड द एरा/एज/ डेट रहा हूँ। अर्थात् मैं आधुनिक विचार, परम्परा, ज्ञान-विज्ञान से भी आगे सोचता हूँ। विद्यार्थी अवस्था में प्रत्येक विषयों को जानने के लिए विभिन्न प्रश्न करने के कारण मेरे एक शिक्षक मुझे 'ब्रह्मा' (नवीन प्रश्नकर्ता/सृष्टिकर्ता) बोलते थे।

कुछ प्रायोगिक संक्षिप्त घटनाएँ : मेरे गृहस्थ जीवन के परिवार की एक जमीन थी जिसको सरकार कब्जे में लेना चाहती थी। उसके लिए कोर्ट का नोटिस आया। हमारे परिवार के लोग घबरा गये। मैं उस समय केवल पाँचवी या छठी कक्षा का विद्यार्थी था। मैं निडर होकर साहस-पूर्वक परिवार को बताया कि इस नोटिस के अनुसार आप कोर्ट मत जाना। पुनः कुछ दिन के बाद एक कर्मचारी कोर्ट से नोटिस लेकर आया। मैं दृढ़ता पूर्वक उस कर्मचारी को बोला, यह जमीन पूर्व से हमारी हैऔर इसके ऊपर हमारा अधिकार है, इसलिए ना हम कोर्ट जायेंगे न किसी प्रकार से कोर्ट के आदेश का पालन करेंगे। उसे विभिन्न दृष्टिकोण से, दृढ़ता से समझाया जिससे वह केस डिसमिस हो गया। दूसरी घटना तब की है जब मैं आठवी कक्षा का विद्यार्थी था। दो भाईयों में लड़ाई होते हुए मैंने देखी थी। कुछ दिनों के बाद जब मैं स्कूल से वापस आ रहा था तो मैंने देखा कि कुछ पुलिस वाले सुपरिटेंडेन्ट के साथ बैठकर दोनों भाईयों को पूछ रहे थे और कुछ लोग वहाँ इकट्ठे हुए थे। मैं स्कूल बैग रखकर के उस स्थान पर आकर कुछ समय तक सुनता रहा, फिर दृढ़ता से पुलिस सुपरिटेंडेन्ट को मैंने पूछा कि क्या आप इस घटना को प्रत्यक्ष जानते हो? जिसे आप निर्दोष मानकर और जिसका रुपया लेकर जिसका पक्ष ले रहे हो वस्तुतः वह दोषी है और दूसरा निर्दोष है। परन्तु दूसरा निर्दोष व्यक्ति दुर्बल, गरीब और भोला भाला होने के कारण उसे फटकार लगा रहे हो और दण्डित करना चाहते हो। मैं स्वयं इस घटना का साक्षी हूँ। जब तक आप इस केस को यही डिसमिस नहीं करेंगे तब तक आपको यहाँ से जाने नहीं दिया जायेगा और आपके विरुद्ध हम सब लड़ेंगे। मैंने प्रायः 10-15 मिनट तक उन्हें दृढ़ता से समझाया जिसके कारण उस केस को भी तत्काल मेरे सामने ही डिसमिस किया गया और एफ.आय.आर. को वहीं फाडकर फेंक दिया गया। मैं जब नवीं और दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था तब हमारे क्षेत्र के विधायक हमारे क्षेत्र के समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण मैंने अकेले ही उनके घर जाकर उनको समस्या के बारे में बताया। मैं जब ग्यारहवीं कक्षा का विद्यार्थी था तब ग्रीष्मावकाश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक विशाल जिला स्तरीय शिविर में भाग लिया था क्योंकि मेरे अंदर बाल्यकाल से ही राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय गौरव, संस्कृति, प्रेम, देश सेवा का भाव रहा है। मैंने एक दिन शिविर में संघ की एक पत्रिका में बीड़ी का विज्ञापन देखा। मैंने वहाँ के प्रचारकों से पछा-संघ की पत्रिका में यह विज्ञापन क्यों हैं? तब उन्होंने बताया कि संघ कार्य के लिए धन की आवश्यकता होती है, उस धन के लिए यह विज्ञापन है। तब मैं बोला-यदि ऐसे है तो संघ के जो उद्देश्य, राष्ट्रीयता, सदाचार, सत्संस्कार, 

व्यसन मुक्ति आदि है उससे यह कार्य विपरीत है और अशोभनीय है। उन्होंने बताया आप इसे संघ के अन्य उच्च पदाधिकारी, सर संघ संचालक आदि से पूछना। संघ के जितने भी बड़े कार्यकर्ता मुझे मिले मैंने उनसे इस बारे में चर्चा की और इसे अयोग्य सिद्ध किया।

मैं विभिन्न विषयों को जानने के लिए एवं शंका समाधान करने के लिए धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय चिंतक एवं लेखकों के सम्पर्क में भी आया। उनसे सत्यासत्य के परिज्ञान के लिए जिज्ञासाएँ भी की। मैं जब आठवीं कक्षा में था मेरे एक सहपाठी के दादाजी जो एक लेखक थे, उनकी एक किताब मैंने पढ़ी। उसमें मैंने एक वर्णन पढ़ा जिसके सत्यतथ्य को जानने के लिए मैंने सहपाठी को पूछा-मेरा सहपाठी कुछ उत्तर नहीं दे पाया और मुझे अपने दादाजी के पास ले गया। मैं विद्यार्थी जीवन से ही सत्यग्राही, सत्साहसी होते हुए भी विनम्र रहा हूँ। उन्हें आदर से प्रणाम करके मैंने पूछा-लेखक महाशय! आपने जो लिखा एक भक्त की भक्ति से प्रभावित होकर पाषाण की मूर्ति बोलती थी-खाती थी, क्या आपने यह देखा? और क्या आप यह साबित कर सकते हैं? लेखक कोई विशेष समर्पित उत्तर नहीं दे पाये। सर्वोदयी नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण से भेट करने के लिए एवं उनसे चर्चा करने के लिए जब मैं कलकत्ता गया तब मैं सरकार एवं कानून के विरुद्ध में 21 पॉइन्ट पॉम्पलेट में छपाकर कलकत्ता में बाँटा था। उसमें से कुछ पॉइन्ट निम्नलिखित थे-

1) कानून को केवल परसाक्षी से न्याय/निर्णय नहीं देना चाहिए। विशेष केस के लिए घटनास्थल पर स्वयं जज को जाकर परीक्षण, निरीक्षण करके निर्णय देना चाहिए।

2) लोक अदालत होना चाहिए जिससे गरीबों को अदालत का चक्कर लगाना नहीं पड़े

और उन्हें पुलिस की यातनाएँ सहना नहीं पड़े।

3) भ्रष्ट नेताओं, मंत्री, सांसदों, विधायकों को पाँच वर्ष के मध्य में भी सत्ताच्युत करना चाहिए आदि आदि।

मैं उनके धार्मिक पण्डित, पुरोहित, साधु-संत, आचार्यों को धार्मिक हिंसा, आडम्बर, अंधविश्वास, भेद-भाव के बारे में पूछता था और उन्हें यह बताता था यह सब अयोग्य है, अकरणीय है और अभी भी यह क्रम जारी है। इसी प्रकार समाज में, जाति में, ग्राम में, नगर में जो भेद-भाव, पार्टी बाजी, फूट आदि करते हैं उसे भी नकारता था और आज भी नकार रहा हूँ। हमारा ग्राम किसी कारण से दो पार्टी (दो विरोधी गुट) में विभक्त हो गया था। हमारा परिवार बड़े गुट में था और छोटे गुट के मुखिया के लड़के से मैंने मित्रता की। एक मित्र तो मेरा पहले से ही छोटे गुट का था। दोनों गुट के व्यक्ति एक दूसरे के घर पर आना-जाना, लेन-देन बंद कर दिये थे। यह सब कुछ अच्छा नहीं लगा। उस समय मैं चौथी-पाँचवी कक्षा का विद्यार्थी था। मेरे जन्मजात संस्कार में भेद-भाव, लड़ाई-झगड़ा, ईर्ष्या-द्वेष, तेरा-मेरा रहा ही नहीं। परन्तु इससे विपरीत सहिष्णुता, संगठन, सेवा, प्रेम का भाव एवं व्यवहार ही रहा है। इसलिए दोनों गुटों को मिलाने के लिए, भेद-भाव दूर करने के लिए मैं प्रयास करता रहा। दोनों गुट की पर्वाह किए बिना मैं मेरे मित्र के यहाँ जाना, खाना खाना, एक साथ बातचीत करना, घुमना आदि करता रहा। यह सब हमारे बड़े गुट के लोगों को सहन नहीं हुआ। वह मुझे यह सब करने के लिए मना करने लगे व नाराज होने लगे। वे सब मेरे से उम्र, अधिकार एवं संबंध में बहुत बड़े थे तथापि उनका अनादर किये बिना ही मैं पूर्वोक्त काम को अधिक करने लगा। सबके सामने ही मुख्य गली में मेरे विरोधी पार्टी के मित्रों के कंधे से कंधा मिलाते हुए सबको जताते हुए, बताते हुए, दिखाते हुए और भी अधिक जाने आने लगा। मेरा बाल्यकाल से व्यवहार सबके प्रति नम्र, शालीन, सहयोगपूर्ण होने के कारण और उपर्युक्त मेरे व्यवहार से प्रभावित होकर धीरे-धीरे अन्य बच्चे व बड़े परस्पर मिलने-जुलने, बोलने-चालने लगे जिससे दोनों गुट मिल गये। इसी प्रकार ब्रह्मचारी अवस्था में भी झकोरा (म.प्र. बुंदेलखण्ड) में भी दो विरोधी गुटों को मिलाया। उपाध्याय अवस्था में कर्नाटक में महिषवाड़ी के लोगों की कटुता/दूरी को दूर किया। इसी प्रकार धार्मिक सम्प्रदाय, पंथवाद में जो कटुता/दूरी है उसे मैं बाल्यकाल से न स्वीकार करता हूँ, न बढ़ावा देता हूँ, परन्तु उसे दूर करने के लिए यथा योग्यपूर्ण प्रयास करता हूँ। भले उन पंथों के गुणों के साथ-साथ दोषों को भी जानता हूँ। मैं हर व्यक्ति, पंथ, सम्प्रदाय, समाज, संगठन आदि के गुणों को स्वीकार करता हूँ किन्तु दोषों को स्वीकार नहीं करता हूँ। दोषों को लेकर उनसे घृणा नहीं करता हूँ। सन्दर्भ के अनुसार दोष दूर करने के लिए जताता, बताता, लिखता भी हूँ। इसलिए मेरे भक्तों में दिगम्बरों के साथ-साथ हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, गायत्री परिवार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विहिप, गौरक्षा, नारायण सेवा संस्थान, हृदय परिवर्तन आंदोलन तथा विभिन्न राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता भी है। इतना ही नहीं मेरे द्वारा स्थापित 1) धर्म दर्शन विज्ञान शोध संस्थान 2) धर्म दर्शन सेवा संस्थान के कार्यकर्ताओं में भी दिगम्बर एवं श्वेताम्बर जैन के साथ हिन्दू भी है। जो कि विशेषतः वैज्ञानिक, प्रोफेसर, इंजीनियर, प्राध्यापक, न्यायविद् है। इतना ही नहीं हर प्रवचन, शिविर, साहित्य, लेख, संगोष्ठी आदि में विभिन्न धर्म, दर्शन, विज्ञान, गणित, इतिहास का भी समन्वय करता हूँ। यह समन्वय द्रव्य की प्रकृति, अनेकान्त सिद्धान्त की प्रवृत्ति एवं विश्व की आवश्यकता है।

सहिष्णुता, समन्वय, समता एवं अनेकान्त को मैं प्रायोगिक रूप में जीवन में अपनाते हुए भी असत्य, हठग्राहिता, तानाशाही, दबाव, दोष आदि को नकारने के लिए भी सत्साहस से लबालब भरा हूँ। कांजी पंथियों ने एकांत, हठवाद को लेकर अनेकान्त, समन्वय, संगठन, अहिंसादि श्रावक एवं मुनिव्रत, साधु-संत एवं पुण्य को नकारने, उनसे घृणा करने लगे, समाज में विषमता फैलाने लगे उसे भी दूर करने के लिए मेरे नेतृत्व में हमारे संघ ने पूर्ण प्रयास किया। हमारा यह प्रयास कर्नाटक, महाराष्ट्र (नागपुर), उत्तर प्रदेश (हस्तिनापुर), राजस्थान (जयपुर) तक लगातार छः-सात वर्ष तक चलता रहा। नागपुर में उन्होंने कोर्ट में केस भी किया। कोर्ट में हमने ये पक्ष रखा की हमें किसी पंथ, मत, व्यक्ति से किसी भी प्रकार का द्वेष, भेद-भाव या घृणा नहीं है। परन्तु वे लोग जो जैन धर्म के नाम पर जैन धर्म के विरुद्ध में प्रसार-प्रचार कर रहे हैं उन्हें हम स्वीकार नहीं करते हैं। कोर्ट ने कुछ ही दिनों में निर्णय दिया कि कांजी पंथी (मुमुक्षु) जैन धर्म नहीं है यह एक स्वतंत्र पंथ है। कोर्ट का निर्णय एक छोटी पुस्तिका के रूप में हिन्दी, अंग्रेजी में महासभा द्वारा प्रकाशित किया गया। यह सब करते हुए भी उस समय या अभी भी उनके प्रति किसी भी प्रकार की घृणा, कटुता मेरे मन में नहीं है। उस समय भी जब वे चौका लगाते थे तब हम उनके चौके में आहार करने के लिए जाते थे। वे पढ़ने के लिए आते हैं तो मैं पहले भी पढ़ाता था अब भी पढ़ाता हूँ। तथापि एकान्त, हठग्राहिता, दूषितमनोवृत्ति, दुव्यवहार को न स्वीकार करता था और न अब करता हूँ। इनका मत (कांजीमत) जैन धर्म, विज्ञान तथा विश्व के विरुद्ध है। इसे सिद्ध करने के लिए मैंने 1) अनेकान्त सिद्धान्त 2) निमित्त उपादान मीमांसा 3) पुण्य पाप मीमांसा 4) ज्वलंत शंकाओं का शीतल समाधान लिखा है। तथापि कटु भाव या शब्द का प्रयोग नहीं किया हैं। 

मैंने विद्यार्थी जीवन से विभिन्न धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म का भी अध्ययन किया एवं उनके साधु-संतों से भी चर्चाएँ की। ब्रह्मचारी अवस्था में मैं राजग्रही में बौद्धों के विहार (मंदिर. मठ. स्तप) में साधओं के साथ चर्चा के लिए गया। वहाँ कुछ साधुओं से मेरी चर्चा हुई। चर्चा के अन्तर्गत क्षणिकवाद, अनात्मवाद पर भी चर्चाएँ हुई। दूसरे दिन जब मैं फिर से चर्चा के लिए गया तो बौद्ध भिक्षु बाहर गये हुए थे। उनके लिए मैंने कुछ समय प्रतीक्षा की। जब वे बाहर से आये तो उन्होंने मेरा नाम पुकारते हुए कहा-“आप आ गये''? मैंने तत्काल उत्तर दिया क्षणिकवाद व अनात्मवाद के अनुसार हम दोनों कल ही नष्ट हो गये, फिर आपको कैसे स्मरण है कि मैं वही कल का व्यक्ति हूँ और आप भी वही कल के व्यक्ति हो। बौद्ध भिक्षु निरुत्तर हो गये तथा कहने लगे इसका उत्तर हमें मालूम नहीं है परन्तु बौद्ध ग्रंथों में क्षणिकवाद आदि का वर्णन है।

जब मैं विभिन्न धार्मिक तीर्थ, साधु-संत आदि के दर्शन, श्रवण, मंथन, परीक्षण करते हुए सम्मेद शिखर में आचार्यश्री विमल सागर जी गुरुदेव के अचौर्य धर्म के बारे में प्रवचन सुना तब प्रवचन के अंत में सभा में ही प्रश्न किया 'गुरुदेव क्या रात को अंधेरे में छिपकर चोरी करना ही चोरी है या दिन में भी मिलावट, शोषण, भ्रष्टाचार, ठगबाजी, ब्याजखोरी करना भी चोरी है'? आचार्य श्री ने केवल 'हाँ'' संक्षिप्त उत्तर दिया। मैं बाल्यकाल से ही भारत में जो मिलावट आदि होती हैं उसे बहुत बड़ा पाप/ हिंसा/चोरी/भ्रष्टाचार मानता हूँ। बाल्य विद्यार्थी अवस्था में विभिन्न साहित्य में पढ़ा, विभिन्न प्रवचन, भाषण, चर्चा में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, परोपकार, विभिन्न दान, सादा जीवन उच्च विचार, स्वार्थ त्याग, सहिष्णुता, प्रामाणिकता, वीतरागता, निष्काम कर्मयोग, वीतराग विज्ञान, शरीर आदि भौतिक तत्त्व आत्मा से भिन्न, चार आश्रम, चार पुरुषार्थ आदि भारत की महानता है, इसे भारत महान् है ऐसा सुना परन्तु प्रायोगिक रूप में भारत में जो व्यापार, राजनीति, कानून, समाज तथा कथित धार्मिक जनों में उपर्युक्त गुणों से विपरीत दुर्गुणों को पाया; यह भी मेरे वैराग्य का मुख्य कारण बना। जब 1983 में हमारे संघ का चातुर्मास तुमकुर (कर्नाटक) में था उस समय दिल्ली में कोई जैन उपनाम लगाने वाले ने डालडा में कई क्विटल चरबी मिलाई थी। जब पत्रिकाओं में यह प्रकाशित हुआ तब वहाँ के मेरे लिंगायत, हिन्दू भक्त मुझे बार इस संबंध में उलाहना देते रहे और आम सभा में इसके बारे में राय प्रकट करने का आग्रह किया। 21 दिन के त्रिलोक तिलक महामण्डल विधान पूजा के प्रवचन में जब मैंने बताया कि “ऐसा कार्य करने वाला वस्तुतः जैन धर्मावलम्बी हो ही नहीं सकता'' और हम उसे जैनी रूप में स्वीकार नहीं करते हैं।'' तब जाकर सब शांत हुए। ऐसी और भी घटनाओं के कारण मैंने जो नाम के आगे ‘जैन' उपनाम लगाने का अभियान चलाया था उसे धीरे-धीरे बंद कर दिया। क्योंकि इससे महान् जैन धर्म का अपमान होता है। कोई व्यक्ति विशेष के कारण महान् जैन धर्म की निंदा हो यह मेरे लिए असहनीय है।

हमारा संघ (प्रायः 35 साधु-साध्वी) दक्षिण से विहार करता हुआ आरा (बिहार) में चातुर्मास करके बडौत (उत्तर प्रदेश) चातुर्मास के बाद मुजफ्फरनगर में चातुर्मास हुआ। उस अवधि में दंगे के कारण प्रायः एक महीने का कयूं लगा। श्रावक लोग आ. कुंथुसागर जी गुरुदेव के पास आकर कहने लगे कि “यह क्षेत्र दंगे का एवं अति संवेदनशील है और नगर भी बड़ा है। इसलिए कयूं में हम सभी श्रावक चौका (आहार व्यवस्था) यही जैन औषधालय (चातुर्मास स्थान) में ही लगायेंगे।'' तब आचार्य श्री ने कहा- “मैंने संघ का अनुशासन एवं व्यवस्था का उत्तरदायित्व उपाध्याय श्री (सद्य में आ. श्री कनकनन्दी जी) को सौंपा है आप उन्हीं से इस संदर्भ में विचारविमर्श कर निर्णय लो।'' (मैंने प्रायः 15 वर्ष तक आचार्यश्री की आज्ञा से संघ का अनुशासन एवं व्यवस्था का उत्तरदायित्व वहन किया) वे सभी श्रावक मेरे पास आये और मुझे सम्पूर्ण विषय सविस्तार कहा। मैंने उनकी बातों को सुनकर कहा कि - "हम कोई दंगा करने वाले नहीं है। हम सरकार या प्रशासन के ऐसे किसी भी कानून को नहीं मानते और न उसके अधीन में काम करने वाले हैं, हम आत्मानुशासी है, हमारा आत्मानुशासन आध्यात्म से प्रेरित है।" दुसरा मुझे कानून का एवं राजनीति का प्रायोगिक ज्ञान विद्यार्थी जीवन से है। मैंने कहा कि - "हम न किसी से दबते हैं, न किसी से डरते हैं और न किसी को दबाते हैं, न किसी को डराते हैं। आप तो नगर में ही चौका लगाइये तथा पहले से भी अधिक दूर-दूर चौका लगाइये, सब से दूर वाले चौके में मैं स्वयं आहार करने जाऊँगा। तब मैं देखुंगा प्रशासन, पुलिस, सरकार, कानून हमारे प्रति क्या व्यवहार करते हैं और फिर मैं उन्हें प्रशासन, कानून सिखा दूंगा। मुजफ्फरनगर तब प्रायः 15-16 लाख जनसंख्या वाला नगर था। वहाँ के जैन लोग उच्च शिक्षित, श्रीमान्, धीमान् एवं गुरुभक्त हैं। वहाँ का अधिकांश उच्च शिक्षित वर्ग मेरे पास पढ़ने, मेरे साहित्य में कार्य करने, सेवा, आहार दानादि कार्य करने के लिए आते थे। इसलिए उन्हें मेरे ज्ञान, अनुशासन, दृढ़ता का पहले से ही परिचय था। इसलिए उन्होंने मेरे कहने के अनुसार नगर में ही चौका लगाया। दूसरे दिन मैं सबसे दूर वाले चौके में आहार के लिए गया। मेरे पीछे-पीछे

और चौका में आहार देखने के लिए पहले से भी अधिक लोग इकट्ठे हो गये। आहार करके वापस आते समय रास्ते में जितने पुलिस वाले मिले सभी को मैंने बताया कि हमारे पास आने वाले, हमें आहार देने वाले को किसी प्रकार का निषेध नहीं करना, रोकना नहीं। कयूं के कारण स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, व्यापार, यातायात सभी बंद हो गये थे परन्तु जैन औषधालय में पहले से भी अधिक लोग हमारे पास स्वाध्याय आदि में आने लगे। जैन औषधालय मानो सभी के लिए कयूं मनाने का केन्द्र स्थल बन गया था। लगभग एक महीने के बाद दंगा और भी भयंकर हुआ। बंदुक, तलवारें चलने लगी, कई व्यक्तियों की मृत्यु हुई तथा अनेक घायल हुए जिसके कारण मार्शल लॉ लग गया। घर में सभी नजरबंद हो गये, दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश था। श्रावक लोग अधिक घबरा गये। हमारा संघ भी विशाल था। इसलिए चौका के लिए, आहार देने के लिए साधु-संतों को लाने ले जाने के लिए श्रावकों का आना जाना भी अनिवार्य था इसलिए श्रावक लोग मेरे पास गिड़गिड़ाते हुए आये और अनुरोध करने लगे गुरुदेव! अभी तो मार्शल लॉ लग गया अब हम क्या करें, हमें आप अनुमति दीजिए कि हम सभी मिलकर जैन औषधालय में ही चौका लगायेंगे। मैंने पुनः दृढ़ता और गंभीरता से कहा नहीं यह कदापि संभव नहीं। हम प्राकृतिक न्याय के अनुसार चलने वाले हैं। क्या पक्षी, सूर्य, चन्द्र, वायु आदि मनुष्य के कानून को मानते हैं? हम भी स्व-पर को बिना कष्ट दिये व्यवहार करने वाले है। इसलिए मार्शल लॉ को भी नहीं मानते हैं। श्रावक लोग मेरे दृढ़ता से निरुत्तर होकर चले गये। दूसरे दिन जब मैं आहार के लिए जैन औषधालय से निकल रहा था कि मिलेक्ट्री की 10-12 गाडियाँ अचानक मेरे सामने आ गई। मैं और भी दृढ़ता से उन मिलेक्ट्री की गाड़ियों की ओर बढ़ता गया। सम्पूर्ण गाड़ियाँ रुक गई। सब सैनिक मुझे आश्चर्य से निस्तब्ध होकर देखते ही रह गये। एक दिन अशोक वकील और मैं दूर्बिन से मार्शल लॉ के कारण शांत/स्तब्ध नगर को देख रहे थे कि दो पुलिस मैन एक दूध वाले को मारते हुए खदेड़ रहे थे। इससे मुझे बहुत पीड़ा हुई। मैंने पुलिसवालों को बुलाकर समझाया कि बेचारे निर्दोष दूधवाले को मारना उचित नहीं है। महीनों के कप! एवं मार्शल लॉ के कारण दूध वाला तथा दूध प्राप्त करने वाला परिवार कितनी समस्याएँ झेल रहे हैं। क्या इसके समाधान के लिए सरकार, प्रशासन या आप लोगों ने कोई व्यवस्था की है? आप लोग दंगा करने वाले तथा उसके पीछे काम करने वाले नेताओं की तो सेवा/सुरक्षा करते हो और निर्दोष नागरिकों को सताते हो। आगे किसी भी निर्दोष व्यक्ति को नहीं सताने का नियम देकर मेरी पुस्तक 'क्षमावीरस्य भूषणम्'' पढ़ने के लिए दी और हमारे पास आने वालों को रोक टोक नहीं करने के लिए कहा। इसका परिणाम यह हुआ कि “जैन औषधालय'' आना दूसरों के लिए सुरक्षा कवच बन गया। चातुर्मास के अनन्तर हमारा संघ दिल्ली पहुँचा। गांधी नगर में आहार के लिए जाते समय हमारे संघस्थ मुनि कुशाग्रनंदी को किसी ने पत्थर मारा परन्तु पत्थर उन्हें नहीं लगा। जैन महिलाओं ने जाकर दोषी को सजा देने के लिए थाने का घेराव किया। थानेदार ने

आ. कुंथुसागर जी गुरुदेव को महिलाओं को समझाने के लिए थाने में आने का अनुरोध किया और आचार्यश्री की सूचना मुनि कुमार विद्यानंदी ने मेरे पास पहुँचाई। मैंने तत्काल सोच लिया कि नैतिक अधिकार की लड़ाई के लिए यह एक समुचित अवसर है, इसलिए मैंने आचार्यश्री को थाने में जाने के लिए मना कर दिया। दूसरे दिन से इस घटना के कारण प्रवचन में हमसे मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए श्रावकों से लेकर बड़े-बड़े नेता तथा मंत्री अधिकाधिक संख्या में आने लगे। प्रवचन में लगभग 15-20 हजार श्रोता होते थे तथा विभिन्न मंत्री एवं नेताओं के प्रवचन में आने के कारण तथा गर्म वातावरण एवं क्रांतिकारी ओजस्वी प्रवचन के कारण प्रवचन स्थल के चारों तरफ सैनिक पहरा देते थे। प्रवचन में हमने मुख्यतः यह विषय रखा - ‘भारत आध्यात्मिक प्रधान साधु-संतों का देश है। भारतीय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, परम्परा, विरासत, धरोहर आदि साधु-संतों से प्रदत्त है। यदि साधु-संत के योगदान को भारत से ऋण किया/निकाल दिया जाय तब भारत शून्य हो जायेगा। द्वितीयतः भारत एक लोकतंत्रात्मक देश है। यहाँ हर धर्मावलम्बी मर्यादा में स्व-स्व धर्म को पालन करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। जैन धर्म भारतीय प्राचीनतम मूल धर्म है। इसलिए भारत हमारी मूल मातृभूमि है। हमारा सबसे अधिक अधिकार भारत में रहने का है, विचरण करने का है। हम अहिंसक है परन्तु कायर नहीं है। जैन धर्म के संपूर्ण तीर्थंकर एवं शलाका महापुरुष क्षत्रिय राजा-महाराजा हुए हैं। भारत का नामकरण भी इस युग के प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर हुआ। हम सब तक अहिंसा पूर्ण शांतिमय क्रांति करते रहेंगे जब तक हमें पूर्ण अधिकार प्राप्त नहीं होता है। इसी से नेता, मंत्री आदि ने भरी सभा में क्षमा याचना पूर्वक पुनः इस प्रकार दुर्घटना नहीं होने का प्रण किया। हमारा संघ जब राजस्थान के खेरवाड़ा में था तब हम मिलेक्ट्री कैम्प के मध्य होते हुए शौच क्रिया एवं भ्रमण के लिए रोज आते-जाते थे। एक दिन वापस आते समय कैम्प में तैनात एक बंदुकधारी सैनिक ने बीड़ी पीते हुए मुझसे कहा आप नंगे होकर इस मिलेक्ट्री कैम्प से आनाजाना नहीं कर सकते। मैं वहीं दृढ़ता से खड़ा होकर उसे फटकारते हुए कहा कि तुम सैनिक होकर तथा कार्य में तैनात होकर भी बीड़ी पी सकते हो, हम हमारे भारत में मर्यादा से स्वतंत्रता से विहार क्यों नहीं कर सकते? क्या भारत तुम्हारे बाप का है? तुमने क्या भारत को खरीद रखा है? तुम भारत के रक्षक हो या भारतीय संस्कृति के भक्षक हो? भारतीय संस्कृति साधु संस्कृति है। इसलिए भारत में सबसे अधिक अधिकार हमारा है। तुम हमारे रक्षक एवं सेवक हो। उसे मैं 5-10 मिनट तक समझाते हुए डाटता रहा। आस-पास के सैनिक मेरे पास एकत्रित होकर क्षमा माँगते हुए इस प्रकार की दुर्घटना आगे नहीं होगी ऐसा कहा। एक दो दिन के बाद ही वहाँ के मुख्य अधिकारी ने मेरे पास आकर मिलेक्ट्री कैम्प में ही सैनिक के लिए संबोधन करने के लिए कहा। लगभग 1100 सैनिक एवं सैनिक अधिकारी तथा अनेक नागरिक प्रवचन में एकत्रित हुए। मैंने लगातार डेढ़ घंटा भारत की संस्कृति-परम्परा, राजनीति, कानून, सैनिक एवं साधु-संतों के बारे में प्रवचन किया। यह प्रवचन रिकॉर्ड किया गया एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ तथा मेरे साहित्य में भी प्रकाशित हुआ है। इसका फोटो “सर्वोदय शिक्षा मनोविज्ञान'' में भी प्रकाशित हुआ है। इसी प्रकार NCERT (नई दिल्ली) की ग्यारहवीं कक्षा की इतिहास की किताब "प्राचीन भारत'' में जैन धर्म, भ. महावीर, महात्मा बुद्ध तथा वैदिक धर्म के बारे में जो असंगत विषय लिखा गया था उसका भी घनघोर विरोध प्रवचन, संगोष्ठी, रैली, कलेक्ट्री के माध्यम से केन्द्र सरकार, मानव संसाधन मंत्रालय को रिपोर्ट भेजकर संशोधन के लिए ज्ञापन भेजा। अनेक संपादक तथा वैज्ञानिक M. M. बजाज को भी लेखक के पास भेजकर इसे दूर करने के लिए कहा। जिससे इसका संशोधन हुआ। इसी प्रकार 2005 में राजस्थान सरकार ने नई आबकारी (मद्य) नीति के अनुसार मद्य की दुकान की संख्या बढ़ा दी गई एवं मद्य का मूल्य घटा दिया गया तथा इस क्षेत्र में महिलाओं को आगे किया गया। मुझे जब समाचार पत्रों से यह सूचना प्राप्त हुई तब मुझे अत्यधिक खेद हुआ। मैं कुछ दिन तक प्रतीक्षा करता रहा कि कोई इसका विरोध करें किन्तु इसका विरोध पूरे राजस्थान में किसी ने नहीं किया। सर्वप्रथम इसका विरोध प्रवचन के माध्यम से मैंने किया एवं आगे जाकर विशाल रैली निकलवाकर कलेक्ट्री के माध्यम से मुख्यमंत्री को इसका ज्ञापन दिया गया। उसके बाद धीरे-धीरे इसका विरोध पूरे राजस्थान में होने लगा। विभिन्न संगठन मेरे पास आकर इसके लिए मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। गृहमंत्री गुलाबंचद कटारिया को भी प्रत्यक्ष रूप से तत्काल ज्ञापन दिया गया। उन्होंने कहा-यह कार्य अभी तक जयपुर में भी कोई प्रारम्भ नहीं कर पाया है किन्तु आचार्य श्री ने इतनी बड़ी क्रांति की है। गृहमंत्री को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर कहा आपकी सरकार नई आबकारी (मद्य) नीति के माध्यम से व्यक्ति प्रदूषण, परिवार प्रदूषण, आर्थिक प्रदूषण, नैतिक प्रदूषण कर रही हैं। जनता आपके विरुद्ध हो रही है। इस नीति को परिवर्तित नहीं करने पर आपके सरकार की दुर्दशा अवश्य होगी। उन्होंने स्वीकार किया कि विधानसभा में 80% नेता मंत्री आदि शराबी है इसलिए इसका विरोध कोई नहीं कर रहा है। तब मैंने कहा कि मैं यह अभियान चलाता ही रहूँगा। इस प्रकार मैं लोकहित याचिका के माध्यम से, प्रवचन, साहित्य, लेख, शिविर, संगोष्ठी के माध्यम से नशीली वस्तु, हिंसा, बुचड़खाना, अश्लीलता, फैशन-व्यसन आदि का विरोध कर रहा हूँ, और आगे भी करता रहूँगा। इसके लिए मुझे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विहिप, गौरक्षा, अंतर्राष्ट्रीय गायत्री परिवार, हृदय परिवर्तन आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन, सर्वोदय आदि संगठनों एवं विभिन्न धर्मावलम्बियों का सहयोग प्राप्त हो रहा है। मैं इन सबके माध्यम से भारत को पुनः विश्वगुरु बनाना चाहता हूँ।

3) विशेष अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य : पूर्व में मैंने वर्णन किया है कि मैं बाल्यकाल-विद्यार्थी जीवन से ही अध्ययन-अध्यापन एवं शोध प्रवृत्ति वाला रहा हूँ। परन्तु आयु एवं शिक्षा में वृद्धि होने के साथ-साथ मेरी यह प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। मैं विद्यार्थी जीवन से ही विभिन्न विषयों के साथ-साथ चार भाषाओं का भी ज्ञान रखता था। मैं पाँचवीं-छठी कक्षा से ही अंग्रेजी बोलने लगा था। मैं जब आठवीं कक्षा में पढ़ता था तब एक बार हठात् इन्स्पेक्टर (कक्षा निरीक्षक) हमारी कक्षा में आये और अंग्रेजी में 'ऊँट' के बारे में भाषण करने के लिए कहा। इस समय तक मैंने कभी 'ऊँट' देखा ही नहीं था। कक्षा में किसी ने भाषण करने के लिए हाथ नहीं उठाया। तब मैंने खड़े होकर ऊँट के बारे में लगातार पाँच-दस मिनिट तक भाषण दिया जिससे पूर्ण कक्षा, शिक्षक के साथ-साथ वे निरीक्षक भी प्रसन्न हो गये। प्रथम बार जब मैंने वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया तब मैंने ग्राम के पक्ष में भाषण प्रस्तुत किया। विभिन्न भाषाओं के श्लोक, कोटेशन के माध्यम से धार्मिक, वैज्ञानिक, पर्यावरण एवं सांस्कृतिक पक्षों को प्रस्तुत करके मैंने ग्राम को नगर से श्रेष्ठ सिद्ध किया। धारा प्रवाह, साहसपूर्ण भाषण से हमारे विभाग एवं आस-पास के विद्यार्थियों से लेकर शिक्षक तक सानंद आश्चर्य से सुनते रहे व सबने प्रशंसा की एवं मुझे प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। पुरुस्कार में मुझे महात्मा बुद्ध पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की लिखित एक पुस्तक एवं एक दर्पण प्राप्त हुआ। उसके बाद आगे हर प्रतियोगिता में मुझे कक्षा के सहपाठी से लेकर कक्षा शिक्षक एवं पूरा शिक्षण संस्थान मुझे ऐसे कार्यक्रमों का अध्यक्ष बनाते थे। मैं अपने गुरुजनों के साथ उनकी पंक्ति में अध्यक्ष के रूप में बैठता था तथा अंत में अध्यक्षीय भाषण करता था। मैंने बाल्यकाल से ही कभी भी अन्याय का पक्ष नहीं लिया है और न आगे भी लूँगा। मेरी दृष्टि में सत्य ही परमेश्वर है, समता ही साधना है एवं शांति ही प्राप्य है। इन सबके लिए ज्ञान एक मात्र आधार है। इसके लिए मैं सामान्य अनेक विद्यार्थियों से लेकर विद्वान्, प्रोफेसर्स, वैज्ञानिक, साधु-साध्वी, धार्मिक पंडितों से विभिन्न भाषाओं तथा विभिन्न विधाओं का ज्ञानार्जन सतत किया है, कर रहा हूँ और आगे भी सतत करता रहूँगा। जैन धर्म का प्राथमिक ज्ञान मैंने पेरे परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री कुंथुसागर जी से प्राप्त किया। विशेष संस्कृत एवं प्राकृत व्याकरण का अध्ययन श्रवणबेलगोल में सहस्त्राब्दी महामस्तकाभिषेक के अवसर पर पंडित प्रभाकर से किया। उस समय प्रायः 225 आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी एवं पंडितों का सामूहिक स्वाध्याय एवं तत्त्व चर्चा होती थी। उसमें मैंने अनेक गहनतम शंकाओं के समाधान को प्राप्त किया। मेरी मुनि दीक्षा भी सैकड़ों आचार्य, साधु-साध्वी एवं लाखों देश विदेश के श्रावकों के मध्य हुई। मैंने सैद्धान्तिक ज्ञान गणिनी आर्यिका विजयमति माताजी के साथ-साथ अनेक विद्वानों एवं आचार्यादि से प्राप्त किया। अभी अनेक वर्षों से दिगम्बर जैन के चारों अनुयोगों के साथ-साथ श्वेताम्बर जैन, हिन्दू, बौद्ध आदि शास्त्रों का भी अध्ययन कर रहा हूँ। अभी कुछ वर्षों से मैं आधुनिक ज्ञानविज्ञान का विशेष अध्ययन करके तुलनात्मक शोधपूर्ण चिंतन, मनन, अध्ययन, अध्यापन, लेखन आदि का कार्य कर रहा हूँ। भारत में एक दुर्बल प्रवृत्ति है कि विदेश के वैज्ञानिक लोग जो कुछ शोध करते हैं उस ज्ञान/शोध के बाद कहते हैं कि यह ज्ञान तो हमारे भारतीय साहित्य में पहले से ही है। यह पिछलग्गुपना विकास के लिए बाधक है। इसलिए अभी मैं 3-4 वर्षों से “जैन तथ्य जो आधुनिक विज्ञान से परे'' साहित्य एवं लेखन श्रृंखला के माध्यम से भारतीय प्राचीन साहित्य में तथा विशेषतः जैन साहित्य में निहित ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से भी श्रेष्ठ, सत्यतथ्यात्मक है यह सिद्ध करने में सतत प्रयासरत हूँ। इस शृंखला में मैंने अभी तक 1) ब्रह्माण्डीय जैविक, भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान 2) अनन्त शक्ति सम्पन्न परमाणु से लेकर परमात्मा 3) करें साक्षात्कार यथार्थ सत्य का 4) वैज्ञानिक आईन्स्टीन के सिद्धान्तों को पुनः परीक्षण की आवश्यकता 5) ब्रह्माण्ड एवं प्रतिब्रह्माण्डः धार्मिक एवं वैज्ञानिक विश्लेषण 6) करें साक्षात्कार यथार्थ धर्म, भाव, शिक्षा, संस्कृति का प्रकाशन हो चुका है। अभी प्रकाशनाधीन में 1) विश्व का परम विचित्र प्राणी मनुष्य 2) पञ्चविध एकेन्द्रिय जीव 3) लौकिक एवं अलौकिक गणित आदि कृतियों का लेखन कार्य चल रहा है। इन सब विषयों को अभी कुछ वर्षों से अनेक वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स, इंजीनियर, प्राध्यापक आदि को पढ़ा रहा हूँ। मेरे उद्देश्यों को डॉ. राजमल जैन, डॉ. नारायण लाल कच्छारा आदि विदेश में इसे अप्रवासी भारतीय, विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक एवं विभिन्न संस्थाओं में प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अभी तक भारत के प्रायः 100 विश्वविद्यालयों व 14 प्रदेश के प्रायः 300 संस्थानों में साहित्य कक्ष स्थापित हुए हैं। 1) 32 धर्म दर्शन विज्ञान प्रशिक्षण शिविर 2) राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय 13 वैज्ञानिक संगोष्ठी 3) www.jainkanaknandhi.org (इंटरनेट वेबसाईट) 4) Email-info@jainkanaknandhi.org 5) सैंकड़ों धार्मिक प्रशिक्षण कक्षाएँ 6) 150 (अभी 2020 में 335) शोधपूर्ण ग्रंथों का छ: भाषाओं में अनेकों संस्करणों में प्रकाशन 7) सैकड़ों लेखों का 15-50 दिगम्बर जैन, श्वेताम्बर जैन, स्थानीय एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन 8) स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय में प्रवचन, सेमिनार, वेबिनार, शिविर आदि आयोजन हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे।

अभी जैन विश्व भारती लाडनूं एवं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में मेरे साहित्य के लिए ‘आचार्य श्री कनकनंदी जी कक्ष' की स्थापना हो चुकी है। विभिन्न विश्वविद्यालय में मेरे साहित्य के ऊपर शोध कार्य भी हो रहे हैं। यह शोध कार्य निष्पक्ष, वैज्ञानिक, गणितीय पद्धति के माध्यम से एवं आध्यात्मिक, वैश्विक सुख-शांति की दृष्टि से हो रहा है। इसके माध्यम से संकीर्णता, अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता, संकीर्ण राष्ट्रीयता, स्वार्थनिष्ठ राजनीति, अंधा कानून, विदेशियों द्वारा लिखित विकृत इतिहास-संस्कृति, शिक्षा आदि का संशोधन करते हुए यथार्थ सत्य-तथ्य को उजागर करना है। इन सब विषयों को मैं हमारे संघस्थ साधु-साध्वी, ब्रह्मचारी आदि के साथ-साथ अन्य संघस्थ साधु-साध्वियों को भी पढ़ा रहा हूँ। अभी तक हमारे संघ के तथा अन्य अनेक संघ के प्रायः 300 आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी, क्षुल्लकक्षुल्लिका, ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी के साथ-साथ आ. श्री अभिनन्दनसागर जी ससंघ, गणिनी आर्यिका विशुद्धमति माताजी (आ. निर्मलसागरजी की शिष्या) ससंघ, आचार्य विमलसागर जी, भरत सागर जी ससंघ, हस्तिनापुर के शिविर में भारत के लगभग 100 पंडितों के साथ-साथ आर्यिका ज्ञानमति माताजी ससंघ, जयपुर में शिविर तथा कक्षा में हजारों विद्यार्थियों के साथ-साथ जैन संस्कृत कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ-साथ जैन संस्कृत कॉलेज के विद्यार्थियों से लेकर प्राचार्य तक को आचार्य विद्यासागरजी की गृहस्थाश्रम की दोनों बहिनों के साथ-साथ उनकी अनेक ब्रह्मचारिणी को, आचार्य सन्मतिसागर (ज्ञानानन्द) की अनेक ब्रह्मचारिणी को, तथा अनेक जैन के साथ-साथ हिन्दू प्रोफेसर्स को भी पढ़ाया। जब हमारा संघ धारवाड़ (कर्नाटक) बोर्डिंग में था तब धारवाड़ कर्नाटक विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. उमाकंत (अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष निजलिंगप्पा के सुपुत्र) ने मेरे पास आकर धार्मिक, वैज्ञानिक दृष्टि से सापेक्ष सिद्धान्त, अणु सिद्धान्त के बारे में अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया और उन्होंने प्रसन्नता से कहा-जिस सिद्धान्त को मै आपके पास सरलता से समझ गया उस सिद्धान्त को सही रूप से समझने के लिए मैं अभी तक लाखों रुपये खर्च करके जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका तथा दिल्ली तक घूमा परन्तु इन सिद्धान्तों को सही रूप से समझ नहीं सका उसे आपने मुझे बहुत ही सरलता से समझा दिया। इस घटना के बाद तो वहाँ के वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स, विद्यार्थी हमारे पास अध्ययन के लिए उमड़ पड़े। हम जहाँ भी विहार करते थे वहाँ के जैन, हिन्दू, लिंगायत, वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स हमारे साथ-साथ मेरा कमण्डल लेकर चलते थे एवं मुझसे विभिन्न शंकाओं का समाधान करते थे। मैंने समनेवाडी वर्षायोग के अवसर पर धवला का अध्ययन-अध्यापन प्रारम्भ किया जिसमें हमारे संघस्थ 25 साधु-साध्वियों के साथ-साथ समनेवाडी, बेडकीहाल, सदलगा (आ. विद्यासागरजी का जन्मस्थान) के जैन, हिन्दू, लिंगायत के डॉक्टर, विद्वान्, प्रोफेसर्स, वैज्ञानिक तथा विद्यासागरजी की पूर्वाश्रम की दोनों बहने ‘पढ़ने आती थी'। दो कक्षा धवला पढ़ाने के बाद तत्त्वार्थ सूत्र एवं जैन धर्म के वैज्ञानिक पक्ष को पढ़ाने के लिए कॉलेज में एक घंटा जाता था। उस कॉलेज में प्रो. मेहता लिंगायत (जिन्होंने 21 शोध निबंध लिखे हैं) के सहयोग से रात में जागकर शक्तिशाली दूर्बीन से ग्रह-नक्षत्रों का निरीक्षण भी किया। आचार्य श्री देशभूषण जी ने वीर सेवादल के कार्यकर्ता एवं सदस्यों को शिविर में पढ़ाने के लिए मुझे चातुर्मास के बाद कोथली में बुलाया और वहाँ पर लगभग 5000 वीर सेवा दल के कार्यकर्ताओं को धार्मिक प्रशिक्षण के साथ-साथ सेवा, सफाई के बारे में प्रशिक्षण दिया। उसके बाद वीर सेवा दल वाले जहाँ भी सेवा के लिए जाते हैं वहाँ सफाई का उत्तरदायित्व भी वहन करते हैं। इन सबसे प्रभावित होकर त्रिलोकतिलक मंडल विधान के अवसर पर उस क्षेत्र के श्रावक, वीर सेवा दल के कार्यकर्ता, हमारा संघ व आचार्य देशभूषण जी के ससंघ के आग्रह पर एवं मेरी बिना जानकारी, बिना इच्छा के तथा स्टेज पर मना करने के उपरान्त भी ‘सिद्धान्त चक्रवर्ती' की पदवी से अलंकृत किया। इसी प्रकार ‘विश्वधर्म प्रभाकर' दिल्ली में, ‘ज्ञान विज्ञान दिवाकर' रोहतक (हरि.) आदि में अनेक पदवियाँ प्राप्त हुई।

यथार्थ शिक्षा, शिक्षक, विद्यार्थी, शिक्षाफल तथा शिक्षादि में सुधार के लिए 1) सर्वोदय शिक्षा मनोविज्ञान (लघु एवं वृहत्) 2) करें साक्षात्कार यथार्थ धर्म, भाव, शिक्षा, संस्कृति का 3) नैतिक शिक्षा एवं सामान्य ज्ञान आदि ग्रंथों की रचना की तथा दो राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठियों का भी अभी तक आयोजन हो चुका है जिसकी स्मारिका भी प्रकाशित है। इसके साथ-साथ स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों में प्रवचन, वाक्पीठ सम्मेलन में प्रवचन, शिविर, कक्षा, स्कूल-कॉलेज में संस्कृत शिविर, विज्ञान मेला, सांस्कृतिक कार्यक्रम, राष्ट्रीय शैक्षणिक कार्यक्रमों में भाग लेना आदि विभिन्न प्रतियोगिताओं का भी आयोजन हो रहा है। वर्तमान में जो पाठ्य पुस्तकों में इतिहास संबंधी भ्रान्तियाँ, कमियाँ हैं उसे दूर करने के लिए 1) विश्व इतिहास 2) युग निर्माता भगवान् ऋषभदेव 3) अयोध्या का पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक विश्लेषण 4) भारतीय आर्य कौन? कहाँ से? कब से? 5) ऋषभ पुत्र भरत से भारत आदि पुस्तकों की रचना की है। दिगम्बर जैन धर्म में पूजा-पाठ संबंधी भ्रांतियों, कमियों को दूर करने के लिए 1) जिनार्चना भाग-I, II 2) पूजा से मोक्षपुण्य-पाप भी पुस्तकों की रचना की है। जैन धर्मावलम्बियों की भ्रांतियाँ, कमियों को दूर करने के लिए 1) ज्वलन्त शंकाओं का शीतल समाधान 2) धार्मिक कुरीतियों जैं और उपलब्धि 5) जैन धर्मावलम्बियों की दिशा-दशा-आशा आदि की रचना की है।

यथार्थ आध्यात्मिक वैज्ञानिक धर्म (जैन धर्म) के स्वरूप के लिए 1) स्वतंत्रता के सूत्र (तत्त्वार्थ सूत्र) 2) विश्व विज्ञान रहस्य 3) विश्व द्रव्य विज्ञान (द्रव्य संग्रह) सत्यसाम्यसुखामृतम् (प्रवचनसार) 5) अहिंसा का विश्व रूप (पुरुषार्थ सिद्धयुपाय) 6) प्रथम शोध-बोध आविष्कारक एवं प्रवक्ता 7) धर्म दर्शन एवं विज्ञान 8) ब्रह्माण्डीय जैविक, भौतिक एवं रसायन विज्ञान 9) अनन्त शक्ति सम्पन्न परमाणु से लेकर परमात्मा 10) करें साक्षात्कार यथार्थ सत्य का 11) कर्म का दार्शनिक एवं वैज्ञानिक विवेचन 12) आध्यात्मिक मनोविज्ञान (इष्टोपदेश) 13) ब्रह्माण्ड के रहस्य आदि की रचना की ही है।

इसी प्रकार विभिन्न विधाओं के शोध पूर्ण कृतियों में 1) मंत्र विज्ञान 2) स्वप्न विज्ञान 3) भविष्य फल विज्ञान 4) सर्वाङ्ग विज्ञान की वैज्ञानिक गवेषणा (भाव भाग्य एवं अङ्ग विज्ञान-सर्वाङ्ग सामुद्रिक शास्त्र, बॉडी लॅग्वेज 5) धर्म एवं स्वास्थ्य विज्ञान 6) ध्यान का वैज्ञानिक विश्लेषण आदि की रचना की है। मनुष्य के यथार्थ एवं विकृत स्वरूप को प्रकाशित करने के लिए 1) नित्कृष्टतम स्वार्थी क्रूरतम प्राणी मनुष्य 2) मानवीय निकृष्ट संघर्ष का इतिहास 3) संस्कृति की विकृति आदि की रचनाएँ की है। भारत की महानता तथा भारतीयों की कमियाँ, भ्रांतियों को प्रकट करने के लिए 1) भारत को गारत एवं महान् भारत बनाने के सूत्र 2) भारत के सर्वोदय के उपाय आदि की रचना की है। इसी प्रकार धर्म के संस्कृति एवं विकृति को प्रकट करने के लिए 1) धर्म दर्शन एवं विज्ञान 2) हिंसामय यज्ञ का प्रारंभ क्यों 3) शाश्वत समस्याओं का समाधान 4) श्रमण संघ संहिता की रचना की है। आचार्य विद्यासागर के मिथ्यात्व अकिञ्चित्कर को असत्य सिद्ध करने के लिए "दसण मूला धम्मो तहा संसार मूल हेदं मिच्छत्तं'' पुस्तक की रचना की है। इसी प्रकार मेरी विभिन्न कृतियों में सत्य-तथ्य, समता-शांति को सिद्ध करने के लिए तथा प्रचार-प्रसार करने के लिए एवं असत्य, विषमता, विकृति, भ्रांतियों को दूर करने के लिए सशक्त परन्तु सनम्र प्रयास किया है।

4) मेरे अनुभव : मैंने केवल लौकिक ज्ञान-विज्ञान, धर्म-दर्शन, भाषासाहित्य, इतिहास-पुराण आदि के साहित्यों के अध्ययन को जीवन का लक्ष्य एवं ज्ञान का माध्यम नहीं मानता हूँ इसके साथ-साथ भ्रमण, श्रवण, परिसर-प्रकृति-घटना आदि का परीक्षण-निरीक्षण, चर्चा, शंका समाधान को भी ज्ञान का साधन मानता हूँ। इन सबसे भी श्रेष्ठ, ज्येष्ठ, स्थायी, जीवनोपयोगी, यथार्थ ज्ञान है अनुभव। मेरा अनुभव है कि जब तक पानी, शक्कर या आग के बारे में केवल पुस्तकों से पढ़ते रहेंगे, सुनते रहेंगे, बोलते रहेंगे या उसके ऊपर शोध निबंध लिखते रहने पर भी अनुभवात्मक ज्ञान नहीं हो सकता है, जो ज्ञान पानी आदि के सेवन से होता है। उसी प्रकार धार्मिक, लौकिक, वैज्ञानिक या नैतिक, व्यावहारिक आदि के बारे में केवल पढ़ने, सुनने, लिखने, बोलने में वह ज्ञान नहीं होता है जो उसके प्रायोगिक अनुभव से होता है। क्योंकि अनुभव (अनु+भव) अर्थात् जो होने के बाद प्रयोग में आने के बाद जो अनुभूति, परिज्ञान होता है उसे अनुभव कहते हैं। मेरा अनुभव है कि भारत की महानता के पञ्च आयाम स्वरूप 1) भारतीय महापुरुष महान् 2) भारतीय आध्यात्म ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, संस्कार, सभ्यता महान् 3) भारतीय भाषा, कला, स्थापत्य, संगीत, नृत्यादि महान् 4) भारतीय भोजन महान् 5) भारतीय सामाजिक संरचना महान् को भारतीय लोग तहेदिल से दिल एवं दिमाग से नहीं मानते हैं जब तक कि विदेश के लोग स्वीकार नहीं करते हैं वह भी दिखावा एवं फैशन-व्यसन के लिए, स्वयं को आधुनिक प्रगतिशील, श्रेष्ठ, ज्येष्ठ सिद्ध करने के लिए मानते हैं न कि यथार्थ से श्रेष्ठ, ज्येष्ठ है, उचित है इस दृष्टि से। भारत में अभी भी सत्यनिष्ठा, प्रगतिशीलता, वैज्ञानिकता, उदारता, प्रामाणिकता, स्वच्छता, समयानुबद्धता, स्वानुशासन, पूर्ण स्वतंत्रता की कमी है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में गुणवत्ता, उत्पादकता, जीवनोपयोगिता, नैतिकता, व्यावहारिकता आदि की कमी है। सब जानते हैं, मानते हैं कि राजनीति व राजनेता भ्रष्ट हैं परन्तु इसके साथ-साथ भारतीय कानून भी कागजी, जटिल, कुटिल, अर्थ, समय, जनशक्ति की हानि के लिए हैं। कानून भी निष्पक्ष, शीघ्र, प्रामाणिक, सरल-सहज, भारतीय परम्परा के अनुकूल नहीं है। धन बल, सत्ता बल, बाहु बल से कानून को कठपुतली की तरह नचाया जाता है। स्वयं वकील से लेकर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश तक प्रामाणिक नहीं है। समाज में भी समतापूर्ण सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, लेन-देन, उत्सव, समारोह, शादीविवाह आदि की कमी है। समाज में भी सत्ता, सम्पत्ति, डिग्री, दिखावा, आडम्बनर, नकलची, फैशन-व्यसन का साम्राज्य है। सादा जीवन उच्च विचार, प्रामाणिकता, सरलता-सहजता, पवित्रता आदि को महत्त्व मिलना चाहिए वह महत्त्व आज सत्ता, सम्पत्ति, प्रसिद्धि, डिग्री, राजनेता, सेठ-साहुकार, नौकरशाही से लेकर सरकारी चतुर्थ क्लास के कर्मचारी, नौकरों को मिलता है। जो राजनेता लोक सेवक हैं आज वही लोक भक्षक हैं। जो प्रशासक जनता के व्यवस्थापक है वे आज नौकर होकर शाह (राजा) बन गये हैं। जो पुलिस जनता के चतुर्थ श्रेणी के सेवक, रक्षक है आज जनता उनके लिए दासी है। क्या यह सब भारत की महानता है! स्वतंत्रता है! प्रगतिशीलता है! सभ्यता है! संस्कृति है! धर्म जो सर्वोपरि, पवित्र, समता, सुख, शांति के लिए है उसमें भी इन गुणों की कमी सामान्य नागरिक से लेकर धर्म के ठेकेदार साधु-संत, आचार्यों तक में पायी जाती है। धर्म में उपर्युक्त शिक्षा, कानून, समाज आदि में जो भ्रांतियाँ, कमियाँ है अधिक वही पायी जाती हैं। भारत की सर्वोच्च शक्ति आध्यात्मिकता है। आज भारत में आध्यात्मिकता तो अति दूर परन्तु नैतिकता, 

नागरिकता भी सर्वत्र, सर्वदा नहीं पायी जाती है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा एवं नागासाकी के ऊपर अणु बम डालकर विध्वंस किया गया तथापि आज जापान आर्थिक व नैतिक दृष्टि से इसलिए श्रेष्ठ है कि जापानी जनता स्व-संस्कृति, परम्परा, राष्ट्रीयता, प्रामाणिकता, कर्त्तव्यनिष्ठा को सर्वोपरी मानते हैं। भारतीयों को ज्येष्ठ, श्रेष्ठ बनने के लिए पूर्वोक्त भारत के पञ्च आयामों को स्वीकार करना केवल आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। अभी भारत में शिक्षा, टेक्नॉलोजी, संचार विभाग, सूचना, प्रौद्योगिकी विकसित होते हुए भी अभी तक भारत विकासशील देश इसलिए है कि भारत में उपर्युक्त कमियाँ हैं। इन कमियों को दूर करके ही भारत विकसित एवं श्रेष्ठ, समर्थ देश बन सकता है। परन्तु देखा जाए तो बुरे में भी अच्छे होते हैं इस उक्ति के अनुसार भारत में भी अशिक्षित ग्रामीण किसान आदि व्यक्ति अभी भी शिक्षित, धनी, नगर के व्यक्तियों से श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हैं। अभी भी उनमें दया, करुणा, परोपकार, आत्मीयता, प्रामाणिकता, अतिथि देव परायणता, निःस्वार्थता, सरलता, सहजता, कर्त्तव्यनिष्ठा, सेवा परायणता आदि सद्गुण पाये जाते हैं। कुछ शिक्षित एवं धनी व्यक्तियों में भी उपर्युक्त गुण पाये जाते हैं परन्तु इनकी संख्या अति जघन्य है। हाँ कुछ उच्च विचार सम्पन्न, उच्च शिक्षित व्यक्ति वह भी विशेषतः आधुनिक वैज्ञानिक बुद्धि सम्पन्न विज्ञान या गणित के विद्वानों में सरलता, सहजता, गुणवत्ता आदि गुण पाये जाते हैं। परन्तु थोड़े बहुत पढ़े लोगों में, नगर के लोगों में किसी भी क्षेत्र में (राजनीति से लेकर धर्म क्षेत्र) नेतागिरी करने वालों में तथा नौकरशाही करने वालों में सहजता, सरलता, गुणवत्ता आदि कम पायी जाती है। अभी भी सामाजिकता, राष्ट्रीयता, गुरुभक्ति,अतिथि परायणता, भारतीय सभ्यता संस्कृति परम्परा जो बची हुई है वह सब विशेषतः अशिक्षित ग्रामीण जनों के कारण है। शिक्षा में गुणवत्ता की कमी मैंने हिन्दी प्रदेशों में अधिक पायी है क्योंकि हिन्दी प्रदेश में पढ़ाई का ढंग नहीं ढोंग है। यहाँ स्कूल कॉलेज में न शिक्षक सही पढ़ाते हैं न बच्चे सही पढ़ते हैं बल्कि गृहकार्य अधिक देते हैं ट्यूशन, कोचिंग अधिक पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं। इतना ही नहीं शिक्षा की कमी में माता पिताओं का दबाव, अति आकांक्षा, अयोग्यता भी कारण है। येनकेन प्रकार से प्रमाणपत्र प्राप्त करके नौकरी करना या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना अथवा शादी का लक्ष्य विशेषतः है। इस संबंधी विशेष जानकारी के लिए मेरे द्वारा रचित 1) सर्वोदय शिक्षा मनोविज्ञान 2 ) करे साक्षात्कार यथार्थ सत्य का 3) करे साक्षात्कार यथार्थ धर्म, भाव, शिक्षा, संस्कृति का 4) नैतिक शिक्षा सामान्य ज्ञान आदि कृतियों का अध्ययन करें। मेरा अनुभव है कि आधुनिक विज्ञान की विभिन्न शाखाएँ आंशिक सत्य हैं तो कुछ भ्रमपूर्ण हैं तो कुछ परिकल्पनाओं से युक्त हैं। इसका कारण विज्ञान भौतिक तत्त्व, इंद्रियजनित ज्ञान, यांत्रिक प्रमाण आदि को ही सत्य मानता है। परन्तु सत्य केवल भौतिक नहीं होता जो कि केवल इंदियों तथा यंत्रों के माध्यम से परिज्ञात हो जाये। भौतिक स्थूल तत्त्व तो ब्रह्माण्डीय सूक्ष्म तत्वों का एक बहुत ही छोटा भाग है। इसीलिये विज्ञान को सत्यनिष्ठ, परीक्षा प्रधानी, प्रगतिशील बनने के साथ-साथ आध्यात्मिक बनना केवल आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है। इसके बिना वह अनंत परम सत्य तथ्य को पूर्णतः नहीं जान सकता है। तथापि विज्ञान एवं वैज्ञानिकों में सनम्रता, सत्यग्राहिता, प्रामाणिकता, विश्वबंधुत्व, अहिंसा, असंकीर्णता व्यापकता, सरलता, सहजता है वैसा गुण अधिकांश धार्मिकों में भी नहीं पाया जाता है। इसीलिय मेरा विचार अनुभव है विज्ञान को धर्ममय बनना चाहिए एवं धर्म को विज्ञानमय बनना चाहिए तथा धार्मिकों को वैज्ञानिक तथा वैज्ञानिकों को धार्मिक बनना चाहिए। जैनधर्म वस्तु स्वभावात्मक, गणितीय, वैज्ञानिक, उदारवादी, समन्वयात्मक, सर्वजीव हितकारी, सर्वजीव सुखकारी, शाश्वतिक धर्म होते हुए भी आज इसका यह वास्तविक स्वरूप सामान्य गृहस्थ से लेकर साधु संत, आचार्यों में भी नहीं पाया जाता है। संकीर्णता, संकीर्ण स्वार्थपरता, पंथवाद, मतवाद, जातिवाद, ख्याति, पूजा, लाभ, प्रसिद्धि, सत्ता, संपत्ति, लोलुपता, ईर्ष्या, द्वेष भेदभावपना आज धर्म के नाम पर धार्मिक क्षेत्र में पाये जाते हैं। विकृत रूपी बादलों ने जैन धर्म रूपी सूर्य को आच्छादित करके रखा है जिससे उसका प्रकाश स्वच्छता से स्पष्टता से सर्वत्र व्याप्त नहीं हो पा रहा है। जो अनेकांत (सापेक्षसिद्धान्त) स्याद्वाद समस्त वाद-विवादों को निरसन करने वाला है आज स्वयं को अनेकांती कहने वाले जैन लोगों में अधिक पंथवाद, मतवाद, लड़ाई, झगड़ा, कटुता, वैमनस्यता, संकीर्णता, स्वार्थपरता, विषमताएँ पाई जाती हैं। अहिंसा के परिवर्तन में भाव हिंसा, वीतरागता के परिवर्तन में वित्तरागता, समता के परिवर्तन में विषमता, विश्व बंधुत्व के परिवर्तन में साधर्मियों में कटुता, अपरिग्रह के परिवर्तन में परिग्रह लोलुपता, सादा जीवन के बदले में विलासितापूर्ण जीवन, संकीर्ण मानसिकता पाई जाती है। यदि सूर्य को ही राहुकेतु ग्रस रहे हैं तो जुगुनू आदि के बारे में क्या कहा जाये? मेरी सबसे बड़ी पीड़ाओं में से यह भी एक पीड़ा का कारण है। परन्तु सत्ता, संपत्ति, प्रसिद्धि, पंथवाद, मतवाद आदि को चाहने वालों को मेरी यह पीड़ा, उदारता, उत्कृष्टता समझ में नहीं आती है। यह भी एक चिंता एवं चिंतन का विषय है। परन्तु घन अन्धकाररूपी रात्रि के अंतिम प्रहर में जिस प्रकार सूर्योदय के पहले लालिमा दिखाई देती है उसी प्रकार कुछ वर्षों से मेरी उदात्त, व्यापक, सूक्ष्म भावनाओं को कुछ दिगम्बर, श्वेताम्बर, हिन्दू, देश-विदेश के प्रबुद्ध विद्वान् समझने लगे हैं जिससे वे मेरी भावनाओं को मूर्तरूप देने के लिए तथा प्रचार-प्रसार करने के लिए तन-मन-धन, समय, शक्ति से निःस्वार्थ रूप से संलग्न हैं। मेरे विभिन्न अनुभवों को विस्तृत रूप में जानने के लिए मेरी 1) अनुभव चिंतामणि 2 ) नैतिक शिक्षा सामान्य ज्ञान 3) करें साक्षात्कार यथार्थ सत्य का 4) जैन धर्मावलम्बियों की दशा-दिशा एवं आशा आदि पुस्तकों का अध्ययन करें।

5) अन्तःप्रेरणा, अन्तःप्रज्ञा एवं पूर्वाभासः

1. अन्तःप्रेरणा : मेरे बाल्यकाल से प्रायः मेरी उम्र जब 2.5 वर्ष की थी तब से मुझे सामान्य बच्चों से कुछ अलग पूर्व संस्कार से अनुभव, ज्ञान एवं व्यवहार होने लगा था। मुझे मेरी उम्र 2, 2.5 वर्ष की थी तब से लेकर अभी तक की प्रायः हर प्रकार की स्मृति मेरे मस्तिष्क में सुरक्षित है। मुझे लगभग 2 वर्ष उम्र की भी घटनाएँ प्रायः चित्र सहित (दृश्य) याद है। मेरी छोटी बहिन एक तरफ से और मैं दूसरी तरफ से एक साथ माँ का स्तनपान करते थे यह घटना भी दृश्य सहित याद है। मै 3-4 साल की उम्र से ही अन्तःप्रेरणा से, स्वेच्छा से प्रायः हर कार्य करने लगा था। यथाभोजन के पहले हाथ, पैर, मुँह धोना, कुल्ला करना, स्वयं के कपड़े धोना, सुखाना, पहनना, स्नान करना, बिस्तर बिछाना-समेटना आदि आदि। मैं 5 वर्ष की उम्र के बाद स्कूल में पढ़ने गया। मेरी बुद्धिलब्धि, शालीनता, अनुशासनप्रियता से मेरे शिक्षक मुझे प्रथम कक्षा से एक साथ तीसरी कक्षा में प्रवेश दिला दिये। मैंने तीसरी कक्षा से ही स्वयं पढ़ना, दूसरों को निःशुल्क पढ़ाना, स्कूल का हर कार्य यथा-सफाई से लेकर अनुशासन तक स्वेच्छा से करना प्रारम्भ कर लिया था। मैं विद्यार्थी जीवन में हर वर्ष मॉनीटर रहा हूँ। गुरुजी के अनुपस्थिति में कक्षा के अनुशासन से लेकर पढ़ाई तक मैं स्वेच्छा से करता था इसके लिए कक्षा के हर शिक्षक मुझे योग्य मानकर पहले से ही अनुमति देते थे। मैंने बाल्यकाल से स्वेच्छा से अनुशासन पालना, समयानुकूल कार्य करना, शांति से रहना, परोपकार करना, सेवा करना, सहयोग करना प्रारम्भ कर लिया था। हमारे कक्षा के विभाग से लेकर स्कूल के शिक्षक एवं विद्यार्थियों को मैं अपना मानता था और वे मुझे सम्मान देते थे। मैं केवल पढ़ाई में ही अव्वल नहीं रहा हूँ अपितु शालीनता, अनुशासन, शांति, व्यवस्था आदि में भी ज्येष्ठ-श्रेष्ठ रहा हूँ। इसलिए मेरे सहपाठी से लेकर बड़े, छोटे विद्यार्थी मुझे सम्मान देते थे तथा मुझसे डरते थे। मेरी बुद्धिलब्धि अच्छी होने के कारण तथा ध्यानपूर्वक पढ़ने लिखने के कारण शिक्षक जो पढ़ाते थे वह सब याद होने से मैं तीसरी कक्षा तक घर में कम ही पढ़ता था तथा स्वयं विभिन्न खेल सामग्री एवं उपकरण बनाकर खेलता था। तैरना एवं भ्रमण करना मेरे सबसे प्रिय खेल हैं। गर्मियों में एक दिन शाम को खाना खाकर मैं लेटा हुआ था मेरा मझला भाई मुझे सुनाते हुए कहने लगे- “यह तो खाता है एवं सोता रहता है।'' उसके बाद मेरे में जो सप्त ऊर्जा थी वह जागत हो गई उस दिन से लेकर लगातार अभी तक मैं स्वेच्छा से अध्ययनशील हूँ। मैं ग्रीष्मावकाश में या विशेष छुट्टी में भी नवीन-नवीन साहित्यों का स्वेच्छा से अध्ययन करता था। मैं दूर-दूर विभिन्न स्थानों में परिभ्रमण करने के लिए जाता था। छह वर्ष की आयु से ही मैं अकेला ही एकांत में अध्ययन, मनन, चिंतन करता हूँ एवं शयन भी एकांत में ही करता हूँ। छोटी उम्र से ही मैं अकेले दूर-दूर भ्रमण करता था और पर्वत, नदी, जंगल आदि प्रशांत निर्जन स्थानों में जाकर मैं ध्यानादि भी करता हूँ। यह सब कार्य मैं स्वेच्छा एवं निडरता से करता हूँ। इसलिए मुझे एकांत, प्रशांत स्थान अति प्रिय है।

केवल अध्यापन, प्रवचन, सामूहिक तत्त्व चर्चा, शिविर, संगोष्ठी आदि में सबके बीच में रहना अच्छा लगता है, अन्य समय में मुझे एकांत ही प्रिय है। मैं बाल्यकाल से मितभाषी (कम बोलने वाला) हूँ। हाँ धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय चर्चाओं में आनन्द आता है परन्तु गप्पबाजी, अन्याय, असत्य का पक्ष लेना, अनुशासनहीनता, फैशन-व्यसन, दिखावा, आडम्बर, लड़ाई-झगड़ा, गंदगी, प्रदूषण, भीड़-भाड़ आदि कतई पसंद नहीं है। मैं स्वानुशासी, स्वतंत्र विचार सम्पन्न एवं शालीन होने के कारण शिक्षक से लेकर आध्यात्मिक गुरु को भी मुझे विशेष अनुशासित करने की आवश्यकता नहीं पड़ी है। मैं अकेला ही दूर-दूर परिभ्रमणार्थ जाता था एवं मुझे पूर्ण स्वातांत्र्य होते हुए भी कभी भी मैंने फैशन-व्यसन, आडम्बर, भ्रष्टाचार, अनैतिक व्यवहार, नशीली वस्तुओं का सेवन आदि नहीं किया इतना ही नहीं मैं कभी भी होटल का भोजन भी नहीं करता था। इसके कई कारणों में से एक कारण है कि मैं बाल्यकाल से ही वैज्ञानिक बुद्धि सम्पन्न रहा हूँ। तीसरी कक्षा से ही नैतिक शिक्षा, आयुर्वेद, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने लगा था। मैं दूर-दूर प्रवचन, नाटक, ओपन थियटर, ड्रामा, साधु संगति, सामाजिक एवं राष्ट्रीय कार्यक्रमों में जाता था परन्तु परिवार में प्रतिबंध नहीं होने पर भी मैं सिनेमा देखने नहीं जाता था। क्योंकि सिनेमा में वैज्ञानिकता, राष्ट्रीयता, धार्मिकता, नैतिकता नहीं होती है और जिसमें उपर्युक्त गुण नहीं होते हैं उसका मैं स्वेच्छा से बहिष्कार कर देता हूँ। मैं बाल्य विद्यार्थी जीवन से ही वैज्ञानिक विचारधारा वाला, प्रकृति प्रिय, आत्मविश्वासी एवं बोल्डनेस से युक्त होने पर भी सादा जीवन उच्च विचारों को स्वेच्छा से अपनाया हूँ और आगे भी अपनाता रहूँगा। यहाँ तक कि मैंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत छोटी सी उम्र में जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था तब विद्यार्थी अवस्था में आत्मसाक्षी पूर्वक स्वेच्छा से लिया था। मैं विद्यार्थी जीवन से ही बड़े-बड़े नगरों एवं बड़े-बड़े लोगों श्रीमान्, धीमानों के सम्पर्क में आने पर भी मैं दूसरों का अन्धानुकरण किसी भी प्रकार से नहीं करता हूँ। मेरी बुद्धिमता, तर्क शक्ति एवं मेरे साहस के कारण मेरे सादे जीवन एवं उच्च विचारों की खिल्ली किसी ने नहीं उड़ाई है, कभी भी इसे गलत नहीं मानते हैं। यदि कोई किसी प्रकार कुतर्क करता हो तो मैं उसके एक कुतर्क को सौ तर्कों से काट देता हूँ। भले मैं कभी कुतर्की नहीं रहा हूँ सत्य को असत्य एवं अन्याय को न्याय रूप में स्वीकार नहीं किया है तथा समता, शालीनता में ही बाल्यकाल से जीवन जी रहा हूँ। वज्र के समान कठोर होने पर भी पारदर्शी एवं चिकना हूँ। मैं न किसी का अपमान करता हूँ न अपमानकारक कार्य करता हूँ, न किसी के अपमान कारक व्यवहार को स्वीकार ही करता हूँ। परन्तु मेरी यथार्थ गलती को समझ में आने पर तत्काल स्वीकार करता हूँ एवं पुनः उस गलती को दोहराता नहीं हूँ। मैं विद्यार्थी जीवन से ही प्रकृति प्रेमी, पुस्तक प्रेमी एवं बालक प्रेमी रहा हूँ इसलिए मेरे घर के आसपास विभिन्न पेड़ लगाया था। मैंने अध्ययन कक्ष के सामने नारियल का पेड़ लगाया था। मैं पेड़ों को बालकों के जैसे प्रेम से पालन पोषण करता था। एक दिन जब मैं शाम को स्कूल से वापस आया तब मैंने देखा कि नारियल के पत्तों के अन्दर कुछ मिट्टी पड़ी हुई थी। मुझे बहुत दुःख हुआ। मैं पेड़ के पास खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि मेरे पेड़ के ऊपर मिट्टी किसने और क्यूँ डाली है। मैं कुछ समय तक चिल्लाता रहा। मेरे पिताजी वहीं शांत, निर्विकार अवस्था में खड़े हुए सुन रहे थे। कुछ समय के बाद वे शांति से बोले मैंने ही मिट्टी डाली है। यह सुनते ही जैसे मेरे सिर के ऊपर किसी ने पहाड़ डाल दिया हो। मुझे अत्यन्त दुःख एवं पश्चात्ताप हुआ। मैं रोने लगा एवं शाम का भोजन बिना किये ही देर तक रोते हुए सोचने लगा कि हाय धिक्कार है मुझे, जो बिना जाने, समझे, विचार किये मैने इस तरह का व्यवहार किया तथापि मेरे पिताजी कितनी शांति से सुने और उत्तर भी शांति से ही दिया। तब से मैंने शिक्षा ली कि बिना सोच विचार के निर्णय लिए बिना किसी को कुछ भी नहीं बोलूँगा, क्रोध नहीं करूंगा। तब से मैंने कभी भी इस तरह का कार्य नहीं किया। भले ही मैंने कभी भी अन्याय, अत्याचार को सहन नहीं किया परन्तु बिना निर्णय किसी को भी यदवा तदवा नहीं बोलता हूँ और न ही क्रोध करता हूँ। परन्तु दूसरों की गलतियों को न मैं स्वीकार करता हूँ अपरंच योग्य समय आने पर अवश्य जताता, बताता हूँ। पहले भी मैंने वर्णन किया था कि तीसरी कक्षा से ही मैं धार्मिक, नैतिक, राष्ट्रीय पुस्तकों का अध्ययन करने लगा था। मैं विद्यार्थी जीवन से लेकर अभी तक लगभग रात को 12-1 बजे अध्ययन करके सोता हूँ। 7वीं बोर्ड की परीक्षा थी। हमारे एक नए शिक्षक आए हुए थे। मैं प्रायः 1 बजे अध्ययन करके बोर्डिङ्ग में शयन कर रहा था। मैं अच्छा विद्यार्थी होने के कारण मेरी सम्पूर्ण व्यवस्था निःशुल्क होती थी। नये शिक्षक रात के 2.5 - 3 बजे आकर बेंत से सब विद्यार्थियों के साथ-साथ मुझे भी जगाने के लिए पीटा। मैंने कक्षा के समय नम्रता से उन नवीन शिक्षक के व्यवहार के बारे में प्रधानाध्यापक को बता दिया। प्रधानाध्यापक ने नवीन शिक्षक को संपूर्ण जानकारी दी। वे आकर मुझसे क्षमा माँगे। मुझे विद्यार्थी जीवन से लेकर अभी तक इसके अलावा कभी भी मार नहीं पड़ी है। इतना ही नहीं जब मैं विद्यार्थी जीवन में अकेला ही दूर-दूर तक महिनों-महिनों तक भ्रमण किया करता था तब भी बिहार जैसे प्रदेश में कोई दुर्घटना नहीं हुई। इतना ही नहीं मेरे व्यवहार, व्यक्तित्व आदि से प्रभावित होकर दूसरे लोग मेरे रहने की यहाँ तक कि भोजनादि की निशुल्क व्यवस्था करते थे। मैं खुद भी भ्रमण के समय में रोगी, असहायों की सेवा करता था। एक बार मैंने देखा एक बुढिया लकड़ी का गट्ठा लेकर जा रही है तब मैंने पता लगाया कि इस अवस्था में यह लकड़ी का गट्ठा लेकर क्यों जा रही है। इसका कारण यह था कि उसका जवान इकलौता बेटा यक्ष्मा (T.B.) रोग से ग्रसित है। मैं पता लगाते हुए उसकी कुटिया में पहुँचा उसका युवक बेटा खटिया पर कंकाल रूप में पड़ा हुआ था। मुझे बहुत दुःख हुआ। मैं रोज केला आदि एवं औषधि लेकर उनके यहाँ जाता था तथा उसकी सेवा करता था। इतना ही नहीं पशु-पक्षी, गरीब यहाँ तक की वृक्षादि की भी सेवा में मुझे आनन्द व सन्तुष्टि अनुभव होती है। यह सब कार्य दूसरे की प्रेरणा, धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययन से नहीं करता हूँ यह सब कार्य बाल्य काल से स्वेच्छा से करता हूँ। मेरी जो कुछ अच्छी प्रवृत्तियाँ हैं वे सब बाल्यकाल से ही अन्तःप्रेरणा से ही है। मैं धर्म को विश्वास एवं स्वेच्छा से आचरण करने का विषय मानता हूँ न कि विवशता से दिखावा करने का विषय मानता हूँ। पूर्व वर्णित बाल्यकाल से लेकर अभी तक जो सब घटनायें, कार्य हैं वे सब अन्तःप्रेरणा से ही कर रहा हूँ, अभी भी कर रहा हूँ और आगे भी करूंगा। मैं अंधविश्वास से, दिखावे से, दबाव से अन्तःप्रेरणा व अन्तःचेतना को कुचल कर कुछ भी कार्य करने में असमर्थ हूँ। मुझे चाहे कोई गलत माने या सही माने, निंदा करें या प्रशंसा करें, सहयोग करें या विरोध करें तथापि मैं किसी के प्रति खोटा भाव नहीं रखता हूँ न क्षति पहुँचाता हूँ। परन्तु महान् लक्ष्य एवं सत्य, समता एवं शांति के पथ पर अविराम गति से चलता रहता हूँ चाहे मेरी गति धीमी क्यों न हो। कुछ उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ।

1) मैं जब प्रायः 3-4 वर्ष का शिशु था मेरे पिताजी के साथ मेरे मामा के यहाँ गया था। विशाल केनाल में पानी बह रहा था और हम केनाल के पाल में जो रास्ता बना हुआ था उस रास्ते से वापस आ घर आ रहे थे। मध्याह्न का समय था, गर्मी पड़ रही थी उसी बीच विशाल आम के तीन पेड़ थे उस पेड़ के नीचे एक व्यक्ति सो रहा था। नये 10-20-100 रुपये के नोट बिखरे पड़े थे। अभी के रुपये के मूल्य से उस समय उन रूपयों का मूल्य 20-30 गुणा अधिक था। मैंने सभी रुपयों को इकट्ठा किया और स्वेच्छा से उस सजन को जगाकर तथा उन्हें देकर पिताजी के साथ मैं घर वापस आ गया।

 

2) मैं जब ब्रह्मचारी था कुछ साधुओं के साथ मैं सोनागिरी जा रहा था। रास्ते में एक बटुआ (पर्स) मिला। उस पर्स को मुझे किसी ने उठाने के लिए बोला तब मैंने मना किया और बोला कि मैं इसे छुऊँगा भी नहीं। साधु-संत मेरे स्वभाव से परिचित थे अतः उन्होंने मुझे प्यार से समझाया और कहा कि यह पर्स ले लो जिसका हो उसे लौटा देना। मैंने कहा दूसरों की कोई भी चीज चाहे रखी हुई, भूली हुई, पड़ी हुई, बिना अनुमति से लेना चोरी है तथापि साधु के आग्रह के कारण मैंने बिना मन से उस पर्स को उठाया व चैन खोलकर देखने पर पाया कि उसमें 20-50 व 100 रुपयों के नोट भरे हुए थे। प्रायः एक किलोमीटर तक मैं सोचता ही रहा। मैंने उस पर्स को पुनः जहाँ पड़ा था वही पर रख दिया। मैं जीवन में दूसरों को ठगना, चोरी करना, धोखाधड़ी, लड़ाई-झगड़ा, अपमान, तिरस्कार, अन्याय, अत्याचार न करता हूँ, न स्वीकार करता हूँ।

 

3) लावा (राजस्थान) चातुर्मास के अवसर पर मेरे कुछ ग्रंथों का विमोचन था। मैंने वहाँ के श्रावकों को बताया कि कुछ ग्रंथों का विमोचन करना है। श्रावकों ने विचार-विमर्श करके मेरे पास आकर अनुरोध किया 'गुरुदेव जितने ग्रंथों का विमोचन है उसके लिए हमें कितना रुपया देना पड़ेगा?'' वे इन ग्रंथों के प्रकाशन का धन देना चाहते थे। मैंने कहा आपको एक भी पैसा नहीं देना है। द्रव्यदाता और कोई है। आपको तो केवल कार्यक्रम में विमोचन ही देखना है। मेरे एक शिष्य आचार्य कुशाग्रनंदी ने शिविर के लिए मेरा तीन-चार हजार रुपयों का साहित्य मंगवाया। मुझे जब पता चला कि लातुर (महाराष्ट्र) में भूकंप हुआ है तो मैंने सूचित किया कि यह धन वहाँ के भूकंप पीड़ितों को दान में दे देना। परन्तु वहाँ के श्रावकों ने ड्राफ्ट बनाकर मेरे पास रुपया भेज दिया, मैं उसे मेरे साहित्य प्रकाशन में भी नहीं लिया और वहाँ की पाठशाला के लिए दे दिया। क्योंकि एक बार वचन से दान देने की घोषणा करने के बाद स्वीकार करना भी निर्माल्य ग्रहण करने के बराबर है।

 

4) मैं जब अयोध्या की किताब लिख रहा था तब यह विषय श्रावकों को पता चला। कुछ वरिष्ठ श्रावक आकर मुझे कहने लगे यह किताब लिखना ही मत। लिखना है तो प्रकाशित मत करना। प्रकाशित करना है तो नाम नहीं देना। नहीं तो पुलिस आकर जेल में ले जाएगी। अनेक बार भयभीत कराने पर भी मैंने उसे पूर्ण किया। उसका प्रकाशन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किया। उसका विमोचन पदमपुरा, जयपुर के विशाल पञ्चकल्याण महोत्सव में डॉ. गिरिजा व्यास (सांसद) ने किया और उसकी अधिकांश प्रतियों को केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार, सामान्य न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय एवं पार्टियों व सामाजिक संगठनों को संघ ने भेजा। जिसने भी किताब को पढ़ा सभी ने लोहा माना। गुलाब कोठारी (राजस्थान पत्रिका के संपादक) कीअयोध्या संबंधी किताब जब मेरे पास आई तथा मेरी किताब उनके पास गई तब उन्होंने कहा कि मेरी किताब में घटनाओं का वर्णन है। परन्तु आचार्यश्री की किताब में अकाट्य प्रमाण है। इस किताब को लेने व मुझसे चर्चा करने साध्वी ऋतंभरा मेरे पास उदयपुर आयी। संघ के बड़े-बड़े कार्यकर्ता भी मानते हैं कि आचार्य श्री ने जो विषय इस किताब में दृढ़ता से लिखा है हम ऐसे विषय भाषण में बोलने से घबराते हैं व असमर्थ हैं।

 

5) आचार्य विद्यासागर जी ने 25-30 वर्ष पहले मिथ्यात्व को अकिञ्चित्कर के रूप में प्रतिपादित किया। उसके पक्ष-विपक्ष में अनेक वर्षों तक शीतयद्ध चलता रहा। मैंने स्वयं 1983 में तमकर चातर्मास के अंतर्गत उनके पास कई प्रश्न भेजे थे। उन्होंने प्रश्न पढ़े और कहा उपाध्याय कनकनंदी जी को बताये कि इनका उत्तर धवल, जयधवल में मिलेगा। जब मैं धवल, जयधवल का अध्ययनअध्यापन किया तब मिथ्यात्व को आस्रव, बंध एवं संसार के लिए मूल कारण पाया। इसलिए मैंने मिथ्यात्व अकिञ्चित्कर नहीं है परन्तु आस्रव, बंध, संसार के लिए अतिकर है इसे सिद्ध करने के लिए "दसण मुलो धम्मो तहा संसार मूलहेदु मिच्छत्तं'' पुस्तक की रचना की। जब कुछ दिग्गज पंडितों को पता चला कि मैं इस संबंधी पुस्तक लिख रहा हूँ तब वे मुझे नहीं लिखने के लिए अनुरोध, आग्रह के साथ-साथ भयभीत करने की चेष्टा की। मैं पुस्तक में आचार्य विद्यासागर जी का नाम उल्लेख पूर्वक अनेकों प्रश्नों सहित पुस्तक की रचना की। प्रकाशन के बाद मैंने स्वयं कुछ प्रतियाँ आचार्य विद्यासागरजी के पास प्रेषित किया तथा बाद में संस्था से 21 प्रतियाँ कटनी में मंगाकर विद्वत् चर्चा हुई और मेरे पास रिपोर्ट भेजा गया कि इस विषय को यही समाप्त करना चाहिए। मैंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किया कि “हमें जिनवाणी चाहिए न कि जनवाणी''। हम जिनवाणी का आदेश स्वीकार करते हैं न कि दूसरों का। उसके बाद यह विषय शांत हो गया।

इस प्रकार अध्ययन-अध्यापन, लेखन, कक्षा, प्रवचन, शिविर, संगोष्ठी, आहार-विहार, चातुर्मास, मौन, एकांत सेवन आदि उपर्युक्त वर्णित सम्पूर्ण विषय अन्तःप्रेरणा से स्वेच्छा से, करता हूँ, कर रहा हूँ और आगे भी करूँगा। भले उसके लिए बाह्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, व्यक्ति, आवश्यकता आदि का भी उचित योगदान है और रहेगा भी।

स्वदोषों का अन्तःप्रेरणा से परिशोधन :

1). मैं जिस प्रकार से उपर्युक्त कार्यों को अन्तःप्रेरणा से करता हूँ उसी प्रकार से स्वदोष, गलतियों को भी अन्तःप्रेरणा, अन्तःप्रज्ञा से जानकर दूर करता हूँ। वैसे तो मैं जानबूझकर दूषित मनोभाव से किसी भी निर्दोष प्राणी के प्रति दुर्व्यवहार बाल्यकाल से भी नहीं करता हूँ। हाँ जो स्वयं दोषी है या दूसरों के प्रति अथवा मेरे प्रति दोषकारक, अयोग्य, दुःखजनक व्यवहार करते हैं उसे मैं सही नहीं मानता हूँ तथा द्रव्य-क्षेत्र-कालभाव के अनुसार उसे जताने के लिए, बताने के लिए एवं परिशोधन-दूर करने के लिए बोलता हूँ, लिखता हूँ परन्तु प्रतिशोध के लिए कदापि नहीं। ऐसा करने पर मुझे आत्म संतुष्टि होती है, गौरव अनुभव होता है। यदि ऐसा नहीं करता हूँ तो मुझे आत्मग्लानि होती है कि मैंने दोष को दूर करने के लिए, दूसरों के दुःख दूर करने के लिए योग्यतानुसार, स्वेच्छा से काम नहीं किया, उसके लिए योगदान नहीं किया। मैंने जो उपर्युक्त असत्य, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, पापाचार, हिंसा, फैशन-व्यसन आदि के विरुद्ध में कार्य किया और अभी कर रहा हूँ और आगे भी करूँगा। यह सब ऐसा ही शुभ भावना से प्रेरित होकर करता हूँ न कि किसी भी प्रकार के अशुभ भाव या व्यक्तिगत अथवा सामूहिक द्वेष, ईर्ष्या या वैरत्व से। दूसरों के दोषकारक व्यवहारादि से मुझे जितनी आत्मग्लानि होती है उससे अत्यधिक असहनीय आत्मग्लानि, अशांति, तनाव, चंचलता, विक्षोभ, शारीरिक पीड़ा आदि होती है जब मुझसे दूसरों के प्रति मन-वचन-काय से किसी भी प्रकार का अयोग्य कार्य होता है या करवाता हूँ या अनुमोदना करता हूँ। यह आत्मग्लानि आदि और भी भयंकर घनीभूत होती है जब किसी निर्दोष प्राणी (प्राणी से लेकर क्षुद्रजीव) के प्रति अयोग्य व्यवहारादि हो जाते हैं। मुझे तब तक शांति नहीं मिलती जब तक मैं उसके प्रति अधिक अच्छाइयाँ, उपकार, सेवा, सहयोग नहीं कर लेता हूँ। इस कारण से मैं जानबूझकर दूषित भाव से कोई कार्य स्व-पर प्रति नहीं करता हूँ और करने पर (यथार्थ कहें तो किसी कारण से हो जाने पर) स्वेच्छा से क्षमा माँगता हूँ और क्षतिपूर्ति से भी अधिक उपकारादि करता हूँ। मुझसे अच्छा काम (विचार, कथन, व्यवहार) या गलत कार्य हुआ है तो मुझे स्वयं ज्ञात हो जाता है। जिस कार्य से मुझे शांति, संतुष्टि, स्फूर्ति, स्थिरता, प्रसन्नता, ज्ञान की प्रखरता, तन-मन में हलकापन आदि अनुभव में आते हैं तो वह कार्य अच्छा है और जिस कार्य से उपर्युक्त अच्छे अनुभव से विपरीत अनुभव होते हैं यह कार्य बुरा है। अर्थात् अच्छे कार्य का फल शांति है तो बुरे कार्य का फल अशांति है या अच्छे कार्य कारण है तो शांति कार्य है और बुरे कार्य कारण है तो अशांति कार्य है। यह कार्य कारण सिद्धान्त या क्रिया प्रतिक्रिया सिद्धान्त मेरे स्व-प्रवृत्त अनुभव से अनुभूत भी है। मैं बाल्यकाल से इस कारण से दूसरों के बिना प्रेरणा या उपदेश अथवा अनुशासन से मैं स्वयं अच्छा कार्य करता हूँ एवं बुरे कार्य नहीं करता हूँ।

2). अन्तःप्रज्ञा : पूर्व में भी मैंने वर्णन किया है कि पूर्व जन्म के संस्कार के कारण अनेक सत्प्रवृत्तियाँ मेरे अन्दर बाल्यकाल से ही पनपने लगी थी। अन्तःप्रज्ञा, प्रतिज्ञा से मुझे जो कुछ धर्म, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, कानून, समाज व्यवस्था, भविष्य कालीन घटनायें आदि संबंधी यथार्थ-अयथार्थ कमियों एवं भ्रांतियों के बारे में दूसरों से बिना सुने व ग्रंथों से बिना पढ़े भी ज्ञान हो जाता है। उस संबंधी जब मैं कुछ दूसरों को बताता हूँ, पढ़ाता हूँ या प्रवचन में बोलता हूँ तो अधिकांश व्यक्ति उसे समझते नहीं हैं या गलत मानते हैं। परन्तु धीरे-धीरे जब मैं विशेष श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम ग्रंथों का अध्ययन करता हूँ या वैज्ञानिक अनुसंधान होता जाता है अथवा सामाजिक परिवर्तन, राजनैतिक या कानूनी परिवर्तन होते हैं तब मेरे अन्तःप्रज्ञा से जायमान विचार धीरे-धीरे सत्य सिद्ध होते जाते हैं। इस संबंधी विशेष परिज्ञान के लिए मेरे द्वारा लिखित 1) विश्व विज्ञान रहस्य 2) भविष्य फल विज्ञान 3) स्वप्न विज्ञान 4) ब्रह्माण्डीय जैविक, भौतिक एवं रसायन विज्ञान 5) अनन्त शक्ति सम्पन्न परमाणु से लेकर परमात्मा 6) सर्वोदय शिक्षा मनोविज्ञान आदि कृतियाँ अवलोकनीय है। तथापि कुछ संक्षिप्त उदाहरण यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यथा- 1) विज्ञान में वर्णित अणु/परमाणु को मैं अखंडित शुद्ध नहीं मानता था। 2) प्रकाश की गति परम नहीं मानता था। 3) डार्विन के विकासवाद को संपूर्ण सत्य नहीं मानता था। 4) फ्रायड के मनोविश्लेषण को एकांगी मानता था। 5) भारतीय आर्य विदेश से आये ये नहीं मानता था। 6) मनुष्यों के पूर्वज बंदर हैं न पहले मानता था न अब मानता हूँ। 7) अंधकार एवं छाया को मैं पहले से पुद्गल मानता था। आदि विषय पहले स्कूल, कॉलेज की पुस्तकों में वर्णित नहीं था और देश विदेश के वैज्ञानिक शोधार्थी, लेखक के द्वारा प्रचारित-प्रसारित नहीं किया गया था परन्तु धीरे-धीरे मेरी अन्तःप्रज्ञा से जो विचार उत्पन्न हुए थे, हो रहे हैं वह सिद्ध होते जा रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय शिक्षा पद्धति, विषय वस्तु, उद्देश्य, परिणाम, कानून, राजनीति, संविधान आदि के बारे में जो विचार पहले ही मेरे अन्तःप्रज्ञा से उत्पन्न हो रहे थे, अभी हो रहे हैं वही अब धीरे धीरे सिद्ध होता जा रहा है।

3) उपर्युक्त अन्तःप्रेरणा, अन्तःचेतना से अनुश्रुत मुझमें पूर्वाभास की भी चेतना है। मैं बाल्यकाल से गणितीय, वैज्ञानिक यथार्थपरक परीक्षा प्रधानी, प्रायोगिक व्यक्तित्व का धनी होने के कारण मैं किसी भी विषय को केवल सुनकर या पढ़कर विश्वास नहीं करता हूँ जब तक कि उसकी यथायोग्य सत्यता, प्रामाणिकता मुझे ज्ञात नहीं हो जाती है। इसलिए मैं शकुन, स्वप्न, ज्योतिष, भविष्यवाणी आदि के ऊपर विश्वास नहीं करता था। यहाँ तक कि जिस विषय को मुझसे आयु, शिक्षा आदि में बड़े लोग तथा मेरे शिक्षक भी मानते थे मैं उसे भी नहीं मानता था। परन्तु निषेध में आकर्षण होता है इस नियम के अनुसार उपर्युक्त शकुन, स्वप्न आदि मेरे जीवन में बार-बार सत्य सिद्ध हुए; मानो मुझे बता रहे हो कि हम सत्य हैं, हमें स्वीकार करो। भले मैं किसी विषय को पहले अंधविश्वास रूप में विश्वास नहीं करता हूँ परन्तु जब मुझे किसी विषय की सत्यता जितने अंश में भी ज्ञात हो जाती है उसको उतने अंश में मैं तत्काल स्वीकार कर लेता हूँ। पूर्ण सत्य है तो पूर्ण रूप में, आंशिक सत्य है तो आंशिक रूप में। इस दृष्टि से मैं स्वप्न, शकुन, पूर्वाभास आदि को धीरे-धीरे उसकी प्रामाणिकता के अनुसार स्वीकार करते जा रहा हूँ। मुझे प्रायः जो स्वप्न, शकुन, अन्तःप्रेरणा, अन्तःचेतना तथा पूर्वाभास होते हैं वे प्रायः मेरे अनुभव के अनुसार सत्य सिद्ध होते हैं। इसलिए जिस विषय को मैं बाल्य विद्यार्थी अवस्था में नहीं मानता था  उसके ऊपर मैंने विशाल ग्रंथों की रचना की है। यथा-1) स्वप्न विज्ञान 2) भविष्य फल विज्ञान 3) सर्वाङ्ग विज्ञान की वैज्ञानिक गवेषणा, भाव, भाग्य एवं अङ्ग विज्ञान) की रचना की है। जिसे विशेषतः वैज्ञानिक, प्रोफेसर्स आदि अध्ययन करते हैं एवं शोध कार्यो में प्रयोग लेते हैं। इतना ही नहीं मैं स्वयं इसके अनुसंधान में सतत लगा हुआ हूँ। मुझे स्वप्न, शकुन, अङ्गस्फुरण, छाया पुरुष दर्शन, भावात्मक शकुन एवं पूर्वाभास से स्व-पर राष्ट्र, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, भूकंप, अग्निदाह, राजनैतिक पार्टी के जय-पराजय, रोग, मृत्यु आदि का पूर्वाभास हो जाता है। मैं दीर्घकाल से अनुभव कर रहा हूँ कि मेरा पूर्वाभास ज्योतिषों एवं वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी से भी सत्य सिद्ध होते हैं। ये सब होते हुए भी मैं प्रायः करके न तो दूसरों का हाथ देखता हूँ, न भविष्य बताता हूँ, न ही प्रचार-प्रसार करता हूँ। अति आवश्यक होने पर मैं कभी संघस्थ साधुओं को या मेरे प्रबुद्ध वैज्ञानिक शिष्य आदि को बताता हूँ। जिससे उसके ऊपर और अधिक अनुसंधान हो तथा सत्य-तथ्य का परिज्ञान हो, जिसका सदुपयोग स्वपर, विश्व कल्याण के लिए हो। सामान्य जनता को यह सब बताने पर मेरे समय, साधना और लक्ष्य में व्यवधान पड़ेगा इसलिए नहीं बताता हूँ। अभी कुछ वर्षों से पहले जो थोड़ा कुछ बताता था उससे भी अभी बहुत कम बता रहा हूँ और भी आगे कम करता जा रहा हूँ क्योंकि मैं स्वयं इसको अनुसंधानात्मक प्रायोगिक ज्ञान के साथ-साथ इस शक्ति को बढ़ाना चाहता हूँ। मैंने विभिन्न ग्रंथों में पढ़ा तथा अनुभव किया कि जिसके भाव सरल, सहज तथा पवित्र होते हैं उनके स्वप्न, शकुन, अङ्गस्फुरण आदि सही सिद्ध होते हैं और उन्हें पूर्वाभास भी होते हैं। छाया पुरुष तो उपर्युक्त गुण होने के साथ-साथ जिनका मन स्थिर होता है, उन्हें ही दिखाई देता है। सामान्य लोगों के स्वप्न, शकुन आदि सत्य नहीं होते हैं और सामान्य लोगों की इस संबंध में जो धारणाएँ है वे प्रायः सब गलत धारणाएँ हैं। स्वप्न आदि योग्य, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव आदि चतुःआयाम सिद्धान्त से ही सत्य या असत्य सिद्ध होते हैं। प्रकारान्तर से यह कार्य भी कारण संबंधी, सापेक्ष सिद्धान्त से संबंधित है। मुझे स्वप्न, शकुन, अङ्गस्फुरण, छाया पुरुष दर्शन, पूर्वाभास आदि के कुछ वैज्ञानिक कारण एवं कार्य कारण संबंध का तो ज्ञान है और कुछ का नहीं है जिसका मैं स्वयं अनुसंधान कर रहा हूँ। भले कार्य कारण संबंध का मुझे पूर्ण ज्ञान नहीं है परन्तु उसका परिणाम 

जो सत्य सिद्ध होते हैं उससे मैं इन सबको जानने के लिए और भी ज्यादा उत्साहित हूँ। अधिकांश ज्योतिष, भविष्य वेत्ता आदि दूसरों को प्रलोभित करके या भयभीत करके दूसरों का शोषण करते हैं यथार्थ से उन्हें इन सब का परिज्ञान कम है और उनकी भविष्यवाणियाँ कम सिद्ध होती है।

मेरे अनुभव के संक्षिप्त सार

कटु अनुभव : मैंने पूर्व में भी मेरे विभिन्न अनुभवों का संक्षिप्त में वर्णन किया है और मेरे कुछ पुस्तकों में भी किया है। तथापि यहाँ पर कुछ बिन्दुवार वर्णन कर रहा हूँ।

1) सत्य एवं धर्म : अधिकांश व्यक्ति सार्वभौम, शाश्वतिक, परमसत्य को न जानते हैं, न जानना चाहते हैं। इसी प्रकार धर्म के जो शाश्वतिक, सार्वभौम तथ्य यथा-सत्य, समता, उदारता, सहिष्णुता, परदुःखकातरता, व्यापकता, परोपकारिता, विश्वबंधुत्व, विश्वप्रेम, आध्यात्मिकता, भाव की पवित्रता, सहज-सरलता को न जानते हैं, न जानना चाहते हैं, न प्रयोग में लाना चाहते हैं। केवल कुछ बाह्य धार्मिक क्रियाकाण्ड, रीतिरिवाज, परम्परा, त्याग-तपस्या, पूजा-पाठ, पर्व-त्यौहार, रस त्याग, उपवास, हरी त्याग, भोजन त्याग आदि को ही अधिक महत्त्व देते हैं और इसके कठोरता से पालन से ही धर्म का पालन हुआ ऐसा मान लेते हैं। इन सब बाह्य क्रियाकाण्डों का पालन उपर्युक्त यथार्थ धर्म के लिए सहकारी है तो साधक है नहीं तो यह सब बाधक है, घातक है, विध्वसंक है। क्योंकि उपर्युक्त यथार्थ धर्म के बिना इन बाह्य क्रियाकाण्डों से शारीरिक क्षति के साथ-साथ मानसिक विकृतियाँ यथा-अहंकार, ईर्ष्या, धार्मिक कट्टरता, भेदभाव, आडम्बर, अपव्यय, शब्द प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, सामाजिक प्रदूषण आदि पनपते हैं।

2) शिक्षा : लौकिक या धार्मिक पढ़ाई भी अधिकांश व्यक्ति केवल डिग्री, प्रसिद्धि नौकरी, स्वार्थसिद्धि, सत्ता, संपत्ति, अहंवृद्धि के लिए करते हैं। शिक्षा का तो उद्देश्य सर्वाङ्ग विकास, विनम्रता, उत्पादकता शालीनता, कर्त्तव्यनिष्ठा, अनुशासन प्रियता, उदारता, वैज्ञानिकता, प्रगतिशीलता, समयोचित समायोजना, सादा जीवन उच्च विचार, परोपकारिता, गुणवत्ता आदि हैं। उसे न प्राप्त करते हैं, न बढ़ाते हैं परन्तु विकृत करते हैं, उसे घटाते हैं, उसे नष्ट करते हैं। पहले भारत में ज्ञान (विद्या) दान होता था फिर विद्या का व्यापार हुआ अभी तो विद्या के माध्यम से शोषण चल रहा है।

3) संगठन : अधिकांश सामाजिक, राजनैतिक, संस्थागत यहाँ तक कि धार्मिक पदाधिकारी/कार्यकर्ता सेवा, परोपकार के लिए कर्म कार्य करते हैं परन्तु स्वार्थ, प्रसिद्धि, सत्ता, संपत्ति, अहंवृद्धि, ईर्ष्या प्रवृत्ति एवं दूसरों को नीचा दिखाने के लिए या क्षति पहुँचाने के लिए कार्य करते हैं। विभिन्न संगठन भी एकता, अखण्डता के लिए कम कार्य करते हैं परन्तु विघटन एवं विद्वेष के लिए ज्यादा कार्य करते हैं भले वह संगठन सामाजिक से लेकर राजनैतिक, धार्मिक भी क्यों न हो।

4) समाज : जहाँ पर व्यक्ति परस्पर सहयोग करते हुए सम्मिलित होकर निवास करते हैं उसे समाज कहते हैं। समाज में बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति प्रेम, गरीब, असहाय के प्रति सहयोग का भाव होना जरूरी है। परन्तु समाज में जिसके पास सत्ता, संपत्ति, बाहुबल धनबल है उसे ही महत्त्व दिया जाता है भले वह अन्याय,अत्याचार, पापाचार, भ्रष्टाचार, शोषण, व्यसन, फैशन में लिप्त क्यों न हो। समाज में सादा जीवन उच्च विचार वाले सरल-सहज, विनम्र व्यक्तियों को कम महत्त्व मिलता है।

5) भारत : भारत में राष्ट्रीयता, स्वच्छता, समयानुबद्धता, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, प्रामाणिकता, स्व-संस्कृति, भाषा, परम्परा, महापुरुष आदि के प्रति गौरव भाव कम पाया जाता है। नेता, अभिनेता (नट-नटी, हीरो-हीरोइन), खलनेता (कुख्यात व्यक्ति) आदि को महत्त्व मिलता है परन्तु सज्जन, गुणीजन, ज्ञानीजन, सेवाभावी, कृषक, श्रमिक, वैज्ञानिक, चिन्तक, साधु-सन्त, आदर्श पुरुष यहाँ तक कि माता-पिता एवं गुरुजनों को भी कम महत्त्व मिलता है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, सिद्धान्त, गणित, आयुर्वेद, भोजन, खेल, नृत्य, संगीत, कला, चित्र आदि को भी कम महत्त्व दिया जाता है। अधिकांश भारत के लोग अकल के बिना विदेशियों का या नट-नटियों का नकल करते हैं मानो जैसा कि मदारी बंदर को नचा रहा है या कठपुतली को सूत्रकार नचा रहा है।

मधुर अनुभव : अभी भी भारत में सर्वत्र, सम्पूर्ण जाति, पंथ, परम्परा, विभाग, ग्राम, नगर, शिक्षित, अशिक्षित, धनी, गरीब, संगठन, राजनैतिक दलों में भी अच्छे व्यक्ति पाये जाते हैं भले उनकी संख्या कम क्यों न हो। कुछ अशिक्षित, ग्रामीण व्यक्तियों में धार्मिक, सामाजिक कुरीतियाँ होने पर भी उनमें सरलता, सहजता, उदारता, सेवाभाव, विनम्रता, गुरुभक्ति, गुरुसेवा, अतिथिसेवा, श्रमशीलता आदि गुण पाये जाते हैं। धनी, शिक्षित, नगर के व्यक्तियों में फैशन-व्यसन, आडम्बर, दिखावा आदि दुर्गुण होने पर भी उनमें धार्मिक, सामाजिक कुरीतियाँ कम पायी जाती हैं भले उनमें भी कुछ में शादी-विवाहादि में आडम्बर प्रियता, अतिव्यय बढ़ रहा है। कुछ पुरानी पीढ़ी वाले रूढ़िवादी होने पर भी उनमें आधुनिक अंधानुकरण कम है। आधुनिक पीढ़ी में फैशन-व्यसनादि दोष होने पर भी उनमें उदारता, प्रगतिशीलता, सहिष्णुता आदि गुण पाये जाते हैं। अनेक धार्मिक परम्परा, पर्व-त्यौहार आदि से अंधविश्वास, अपव्यय होने पर भी उससे इतिहास, परम्परा, संस्कृति जीवित रहती है। तीर्थ यात्रा, तीर्थ आदि से अपव्यय, गुण्डागर्दी, शोषण, अव्यवस्था होने पर भी इससे राष्ट्र का भ्रमण, विभिन्न भाषा व संस्कृति का परिज्ञान, ऐतिहासिक ज्ञान, मनोरंजन आदि होता है। विज्ञान के कारण शब्द प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, टी.वी. सिनेमादि के कारण सांस्कृतिक प्रदूषणादि होने पर भी अंधविश्वास, संकीर्णता, कट्टरता आदि घट रहे हैं, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, बाढ़, महामारी आदि से कुछ राहत मिल रही है। वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ यथार्थ धर्म, संस्कृति, परम्परा, भाव, व्यवहार का महत्व बढ़ रहा है तो अयथार्थ धर्म, परम्परादि का महत्व घट रहा है। उच्च वैज्ञानिक ज्ञान, विचार से सम्पन्न व्यक्ति धार्मिक अधिक बनते जा रहे हैं। धर्म को, सत्य-तथ्य को, घटनाओं को समझने, समझाने, लिखने की पद्धति वैज्ञानिक होती जा रही है। इस पद्धति से समझना, समझाना, स्वीकार करना एवं प्रायोगिक करना सरल होता जा रहा है। इससे दूसरे धर्म, जाति, राष्ट्र, परम्परा में निहित सत्य-तथ्य तथा उपकारी विषयों को गुणग्राही अन्य धर्मादि के लोग स्वीकार करते जा रहे हैं। यथा-योग (ध्यान), अहिंसा, शाकाहार, परोपकार, पर्यावरण सुरक्षा, सेवा, शांति, अच्छे भाव, सरलता-सहजता, सादा जीवन उच्च विचार, विश्व बंधुत्व, विश्व शांति आदि आदि।

अ) मेरी भावना : मेरी भावना है कि विश्व के प्रत्येक प्राणी सत्य, अहिंसा, सदाचार, सहअस्तित्व के माध्यम से परम शाश्वतिक शांति को प्राप्त करें। मैं स्वयं इसके लिए आदर्श बनूँ। मेरी भावना है कि मैं किसी भी कारण से, किसी भी परिस्थिति में, किसी भी प्रकार के निन्दा-प्रशंसा, दबाव, प्रलोभन से सत्य, समता, न्याय, शांति से विचलित न होऊँ। यह ही मेरा धर्म, लक्ष्य, साधन, साध्य, प्राप्य, भगवान्, मोक्ष एवं सर्वस्व है।

ब) मेरी रुचि : मेरी रुचि सत्य को जानना, समता में रहना एवं शांति को प्राप्त करना है।

I) इसके अनुकूल अध्ययन, अध्यापन, चिन्तन, चर्चा, चर्या, प्रायोगिकरण, ध्यान, अनुभव, स्थिरता, लीनता।

II) सरल-सहज, उदार, शांत, परोपकारी व्यक्ति (स्त्री-पुरुष, युवक-युवती, बालक, बालिकाएँ)।

III) एकान्त, प्रशांत, स्वच्छ, प्रदूषण रहित, शीतल वातावरण, निवास स्थान, ध्यान-अध्ययन-अध्यापन स्थान, आहारविहार-निहार स्थान।

IV) ताजा, स्वच्छ, पौष्टिक, सुस्वाद, सुगंधित, सुन्दर शीतल, मधुर भोजन पानी। यथा-गरम किया हुआ गाय का ठंडा दूध, गाय का घी, दूध-घी से बनी हुई वस्तु यथा-पूडी, पराठा, रसगुल्ला, हलुआ, गुलाबजामुन, जलेबी, मूंग की दाल, हरी सब्जी (कच्चे केले, तरी ककड़ी, लौकी, परबल, टिण्डसी, पालक, हरा धनियाँ, शिमला मिर्ची), मीठे फल (केले, अंगुर, आम, चीकू, सेब), मेवा (मुनक्का, बादाम, पिण्ड खजूर, चिलगोजा) चावल, खीर, नारियल पानी, थंडाई आदि।

V) बच्चों को पढ़ाना उनसे आहार लेना।

VI) दूसरों की विशेषतः साधु-संत, गरीब, रोगी, पशु-पक्षी आदि की सेवा (उपकार) करना।

VII) साधु-संत, वैज्ञानिक आदि को गहन विषयों को पढ़ाना, उनसे पढ़ना, चर्चा करना।

VIII) शोधपूर्ण गहन विषयों का अध्ययन करना, लेख-साहित्य का लेखन करना।

IX) धर्म दर्शन विज्ञान प्रशिक्षण शिविर में पढ़ाना।

X) वैज्ञानिक संगोष्ठी, कार्यशालाओं का आयोजन।

XI) व्यसन-फैशन, भ्रष्टाचार, फूट, असंगठन, अनैतिकता, हिंसा, बुचड़खाना, अश्लीलता आदि को दूर करके संस्कार, सदाचार, समन्वय, संगठन, उदारता, शांति की स्थापना।

XII) देश-विदेश में सामान्य जनता से लेकर स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, विज्ञान, शिक्षा केन्द्र, न्यायालय, राजनीति, संविधान आदि में सत्य, समता पूर्ण वैज्ञानिक, आध्यात्मिक साधना धर्म का प्रचार-प्रसार, स्थापना करना आदि।

स. मेरी साधना : मेरी साधना है सत्यनिष्ठा, सत्यग्राही, समता, सरलसहजता, सादा जीवन उच्च विचार, कर्त्तव्यनिष्ठा, अनुशासन, समयानुबद्धता, प्रामाणिकता, परीक्षा प्रधान, सत्विश्वास, सदाचार, परोपकार, स्वाध्याय, अध्यापन, मनन, चिंतन, अनुभव, प्रयोग धर्मिता, सहिष्णुता, सत्साहस, परिशोधन, प्रगतिशीलता, नम्रता, शालीनता, उदारता, व्यापकता, एकता, स्व-पर-विश्व शांति, विश्वबंधुत्व, शोध-बोध, लेखन, प्रवचन आदि आदि।

द. मेरे लिए अयोग्य :

I) उपर्युक्त भावना एवं रुचि के विपरीत भावना, स्थान, कार्य, व्यक्ति भोजन आदि मेरे लिए अयोग्य है। यथा-संकीर्णता, कूट-कपट, आडम्बर, मिथ्या, दंभ, लड़ाई, झगड़ा, तनाव तथा इन से युक्त व्यक्ति मेरे लिए अयोग्य हैं।

II) गरमी, प्रदूषण, गन्दगी, मच्छर (क्योंकि मच्छर मुझे अधिक काटते हैं), दुर्गन्ध, भीड़, शोर-शराबा से युक्त वातावरण, स्थान या निवास मेरे लिए अयोग्य है।

III) गरम स्पर्श या प्रकृति से युक्त भोजन, मिर्ची, खट्टी चीज, बासी, दुर्गंधित, बेस्वाद, नीरस, अधिक नमक या मीठा, तेल, मटर, बेसन, मक्का, दही, उड़द, अधकच्चा-अधजला-रुखा-सूखा भोजन, गवार फली, सेंगरी, बाटी, लाडु, चुरमा आदि अयोग्य है। योग्य भोजन भी अक्रम, अव्यवस्थित अथवा अशांति या अच्छी भावना से रहित होकर देना भी अयोग्य है। क्योंकि मेरी विदग्ध अम्लपित्त (एसिडिटी) तथा अत्याधिक शारीरिक गर्मी की समस्या होने से इससे उलटी हो जाती है, विभिन्न शारीरिक, मानसिक समस्याएँ हो जाती हैं। इसलिए गरमी, धूप में चलना, रहना भी अयोग्य है। अनेक बार तो इन सब कारणों से हैजा, पीलिया, भयंकर उल्टी, चक्कर आदि रोग हो गये हैं। इसलिए इस संबंधी सावधानी अत्यन्त आवश्यक है। किसी भी विषय को बार-बार बोलना या सुनना भी मेरे योग्य नहीं है। तुच्छता, अनुशासनहीनता, असमयानुबद्धता, संकीर्णता, अव्यवस्था, मतवाद, पंथवाद, सडी-गली रीति-रिवाज-लेख-पुस्तक-चर्चा-चिंतन-लेखन-प्रवचन भी मेरे योग्य नहीं है। ख्याति, पूजा, प्रसिद्धि, लोकेष्णा, वित्तेषणा, भौतिक लाभ, लौकिक सुख के लिए मेरी न कोई भावना, न रुचि है। इसलिए मुझे जो विभिन्न उपाधियाँ दी गई हैं उसके प्रति मेरी न कोई आसक्ति है न मैं उसे प्रयोग में लाता हूँ। अनिच्छा पूर्वक स्वयं प्राप्त ख्याति, पूजा, प्रसिद्धि, उपाधियाँ आनुषंगिक/सह-उपादक/स्वाभाविक है। मेरे लक्ष्य, साधना, अनुभव, शांत, ज्ञानादि में यह सब सहयोगी/साधक बने बाधक नहीं यह मेरी भी भावना है।

'सर्वेऽपि सुखी भवन्तु।' 'वन्दे तद्गुण लब्धये।'

'ॐ ह्रीं सत्यसाम्यसुखाय नमो नमः।'

आचार्य कनकनन्दी

उदयपुर, राजस्थान 1.7.05 (रात्रि 12.30) (प्रथम संस्करण)